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पदचिन्हों का सम्मान

सम्मान की पराकाष्ठा देखें। सबसे आगे रामचंद्रजी चल रहे थे , उनके पीछे सीताजी थीं और सबसे पीछे लक्ष्मणजी थे। सीताजी रामचंद्रजी के पदचिन्हों के बीच में पैर रखकर चल रही थीं और इस बात से डर रही थीं कि कहीं उनके पैर भगवान के … Read more

. केवट का हठ

जब गंगा नदी के तट पर आने के बाद रामचंद्रजी ने केवट से नाव लाने को कहा , तो उसने प्रेमवश इंकार कर दिया। निषादराज केवट ने कहा कि वह नाव इसलिए नहीं लाएगा , क्योंकि अहल्या की तरह कहीं उनके पैर लगते ही वह नाव स्त्री न बन जा… Read more

वनगमन

रामचंद्रजी के वनगमन के अवसर पर पूरे अयोध्या में हाहाकार मच गया   और लंका में बुरे शकुन होने लगे। देवलोक में सब हर्षित हो गए , क्योंकि उन्हें इस बात का हर्ष था कि उनके कष्टों का अब अंत होगा और राक्षसों का नाश होगा। अयोध्य… Read more

सीताजी का निर्णय

सीताजी को कौसल्याजी ने और फिर रामचंद्रजी ने समझाया कि वे वन जाने के बारे में न सोचें , क्योंकि वन में दुख ही दुख हैं। यदि प्रेमवश हठ करोगी , तो दुख पाओगी। वहाँ की धूप , जाड़ा , वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं। रास्ते में … Read more