Gurjar History : रामचरितमानस सार

Gurjar History

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Saturday, February 22, 2020

अयोध्या आगमन


 रामचंद्रजी और सीताजी के विवाह के बाद भरतजी का विवाह माण्डवी से हुआ, लक्ष्मणजी का विवाह उर्मिला के साथ हुआ और शत्रुघ्नजी का विवाह श्रुतकीर्ति से हुआ। जब चारों पुत्र विवाह के पश्चात अयोध्या लौटे, तो माताओं ने रामचंद्रजी से कहा कि यह सब विश्वामित्रजी की कृपा से हुआ है, जिस कारण उन्होंने राक्षसों को मारा और शिवजी का धनुष तोड़ा।
उन्होंने यह भी कहा कि 'जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।' अर्थात् तुमको बिना देखे जो दिन बीते हैं, उन्हें ब्रह्मा हमारी आयु में जोड़े।
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लक्ष्मण परशुराम संवाद


परशुरामजी अत्यंत पराक्रमी थे और उन्होंने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन किया था। वे बहुत बड़े शिवभक्त थे और शिव धनुष टूटने का समाचार सुनकर भरी सभा में गए थे। जब वे क्रोधित होकर पूछने लगे कि धनुष किसने तोड़ा, तो लक्ष्मणजी ने हँसी-हँसी में कह दिया, धनुष पुराना था, छूते ही टूट गया। उन्होंने कहा, देवता, ब्राह्मण, भगवान के भक्त
और गाय इन पर हमारे कुल में वीरता नहीं दिखाई जाती, क्योंकि इन्हें मारने से पाप लगता है और हार जाने पर अपकीर्ति होती है। इसलिए अपनी शक्ति का दर्प दिखाएँ। तब परशुरामजी ने अपना पराक्रम कहकर सुनाया।
इस पर लक्ष्मणजी बोले, हे मुनि आपके रहते आपकी प्रशंसा दूसरा कौन कर सकता है? शूरवीर तो युद्ध में शूरवीरता का काम करते हैं, ख़ुद अपनी तारीफ़ करके अपने पराक्रम का डंका नहीं बजाते हैं। लक्ष्मणजी ने कहा कि धनुष टूट गया है और आपके क्रोध करने से जुड़ नहीं जाएगा। यदि धनुष अत्यंत ही प्रिय हो तो किसी बड़े कारीगर को बुलवाकर जुड़वा लें। जब यह सुनकर परशुरामजी बहुत गुस्से में गए, तो रामचंद्रजी ने अपने कोमल वचनों से परशुरामजी को शांत किया। फिर परशुरामजी ने रामचंद्रजी की परीक्षा लेते हुए कहा कि राम, अब तुम यह विष्णु का धनुष लेकर इसे चढ़ाओ, ताकि मेरा संदेह मिट जाए। परशुरामजी के देने से पहले ही धनुष अपने आप रामचंद्रजी के हाथों में चला गया। तब परशुरामजी को ज्ञान हुआ कि रामचंद्रजी तो साक्षात अवतार हैं और वे उनकी जय-जयकार करते हुए वहाँ से चले गए।
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Saturday, February 15, 2020

जनकजी की निराशा!


धनुष तोड़कर सीताजी से ब्याह करने के लिए बहुत से राजा उतावले थे। वे सोच रहे थे कि वे सबसे पहले कोशिश कर लें, ताकि कोई दूसरा उनसे पहले यह काम कर ले। लेकिन जब ये उतावले राजा पूरी शक्ति से धनुष को पकड़ते थे, तो वह उठता भी नहीं था। जब बहुत से राजा हार गए और कोई अन्य राजा कोशिश करने के लिए नहीं आया, तो जनकजी निराश होकर बोले, 'बीर बिहीन मही मैं जानी।' यानी पृथ्वी वीरों से खाली हो गई। ऐसा लगता है जैसे ब्रह्माजी ने सीताजी का विवाह लिखा ही नहीं। यदि प्रण छोड़ता हूँ, तो पुण्य जाता है। यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरों से शून्य है, तो प्रण करके हँसी का पात्र बनता। तब विश्वामित्रजी ने अत्यंत प्रेम भरी वाणी में रामचंद्रजी को शिवजी का धनुष तोड़ने का आदेश दिया। सभी नगरवासियों ने देवताओं से प्रार्थना की कि यदि हमारे पुण्यों का कुछ भी प्रभाव हो, तो रामचंद्रजी यह धनुष कमल की डंडी की तरह तोड़ दें। सीताजी निवेदन कर रही थीं, हे गौरी माता, मुझ पर स्नेह करके धनुष के भारीपन को कम कर दीजिए। गणेशजी, मैंने आज ही के लिए आपकी सेवा की थी। धनुष का भारीपन कम कर दीजिए। अंत में सीताजी ने कहा कि यदि मेरा स्नेह सच्चा है, तो रामचंद्रजी मुझे अवश्य ही मिलेंगे। 'जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ कछु संदेहू।।'
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