ONLINE GURUJI: रामचरितमानस सार

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Friday, April 10, 2020

भरत पर संदेह


जब भरतजी रामचंद्रजी को लौटाने के लिए वन में जा रहे थे, तो सेना और अयोध्यावासी भी उनके साथ थे, क्योंकि सभी श्रीरामजी के दर्शन करना चाहते थे। जब निषादराज ने भरतजी को सेना सहित आते देखा, तो उन्होंने सोचा कि भरतजी के मन में कपट भाव हो सकता है। यदि मन में कुटिलता होती, तो सेना साथ क्यों लाते? भरतजी शायद लक्ष्मणजी
और रामचंद्रजी को मारकर सुख से निष्कंटक राज्य करना चाहते होंगे। यह सोचकर निषादराज ने अपने लोगों से कहा कि सारी नावें डुबा दो, घाट रोक लो और भरतजी की सेना से जूझकर मरने के लिए तैयार हो जाओ। भरतजी से मुकाबला मैं करूँगा और जीतेजी उन्हें गंगा पार नहीं करने दूंगा।
निषादराज ने जब लड़ाई का ढोल बजाने को कहा, तो बाईं ओर छींक हुई। शकुन विचारने वालों ने कहा कि जीत होगी, लेकिन तभी एक बूढ़े ने शकुन विचारकर कहा कि भरतजी से मिल लीजिए, उनसे लड़ाई नहीं होगी, क्योंकि शकुन कह रहा है कि विरोध नहीं है। निषादराज गुह ने उसकी बात मानते हुए कहा कि बिना सोच-विचार के जल्दबाजी में कोई काम नहीं करना चाहिए, अन्यथा मूर्ख लोगों को पछताना पड़ता है।
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परशुरामजी की पितभक्ति


मानस में परशुरामजी के अपनी माँ को मारने का प्रसंग आया है, जो इस प्रकार है। एक बार परशुरामजी की माँ रेणुका पानी लेने नदी पर गईं और वहाँ एक सुंदर गंधर्व को तैरते देखकर उस पर मोहित हो गईं। वे भूल गईं कि उनके पति जमदग्नि पूजन के पानी का इंतज़ार कर रहे हैं। जब वे लौटकर आईं, तो जमदग्नि ने जान लिया कि पराए मर्द पर मोहित होने के कारण उनकी पत्नी को देर हुई है। इस पर गुस्सा होकर उन्होंने कुल्हाड़ी देकर अपने पाँचों पुत्रों को एक-एक करके आदेश दिया कि वे अपनी माँ की हत्या कर दें। जैसे-जैसे पुत्र इंकार करते गए, जमदग्नि उन्हें पत्थर में बदलते गए। जब बाक़ी चारों पुत्र पत्थर की शिला में बदल गए, तो सबसे छोटे पुत्र परशुराम ने अपनी माँ को कुल्हाड़ी से मार डाला। जमदग्नि ने जब इस पर प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा, तो परशुरामजी ने यह वरदान माँगा कि उनकी माँ और भाई दोबारा जीवित हो जाएँ और उन्हें यह घटना याद रहे।
इस प्रसंग का भली-भाँति विवेचन करना महत्वपूर्ण है। पहली नज़र में तो किसी स्त्री की हत्या और वह भी माँ की हत्या जघन्य अपराध है, लेकिन परशुरामजी यह भी जानते थे कि अगर उन्होंने पिता की आज्ञा का पालन नहीं किया, तो वे उन्हें पत्थर का बना देंगे। दूसरी ओर, वे यह भी जानते थे कि अगर वे अपने पिता की आज्ञा का पालन करेंगे, तो पिताजी प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देंगे और वे अपनी माँ के जीवित होने का वरदान माँग लेंगे। यही सोच-विचार कर परशुरामजी ने अपनी माँ की हत्या की थी। इस तरह अपनी चतुराई और विचारशीलता से परशुरामजी ने अपनी माँ को पिता के क्रोध से बचा लिया और किसी तरह का नुक़सान भी नहीं होने दिया।
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चित्रकूट



जब रामचंद्रजी चित्रकूट पहुंचे, तो उनका मन वहाँ रम गया। यह देखकर देवता अपने मुख्य भवननिर्माता विश्वकर्माजी को लेकर वहाँ पहुँच गए। सभी देवताओं ने कोल-भीलों के वेष में आकर दिव्य पत्तों तथा घास के सुंदर घर बना दिए। उन्होंने दो सुंदर कुटियाँ बनाईं, जिनमें एक बड़ी और दूसरी छोटी थी।
हमें प्रायः यह पता नहीं होता कि कितने सारे लोग किस तरह से हमारी मदद कर रहे हैं। इसलिए मनुष्य को हर दिन कृतज्ञता का अभ्यास करना चाहिए। देवता जब हमारी मदद करते हैं, तो हमें यह पता नहीं होता कि वे किस वेष में या किस मनुष्य के माध्यम से हमारी मदद कर रहे हैं।
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