Gurjar History : बगड़ावत देवनारायण फड़

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Thursday, February 6, 2020

बगड़ावत देवनारायण फड़ भाग -17



दीपकंवर का युद्ध में काम आना -2


बाबा रुपनाथ जी नियाजी को अपनी कुटिया के अन्दर ले जाते हैं। उन्हें एक जड़ी-बूटी देते हैं और कहते हैं कि इसे अपने साथ युद्ध-भूमि पर ले जाओ। नियाजी को जड़ी देकर बाबा रुपनाथ कहते हैं कि यह ऐसी जड़ी है जिसके असर से सिर कटने के बाद भी तुम ८० पहर तक दुश्मन से लड़ सकते हो। तुम इसे अपनी जांघ पर बांध लो लेकिन इसकी खबर किसी को भी मत देना। बाबा रुपनाथजी निया से कहते हैं कि निया सब पहर का युद्ध करने के बाद सीधा तू मेरे पास आना। नियाजी कहते है बाबा गुरुजी मैदान से दिन भर की लड़ाई के बाद ंगा। ७ कोस चलकर आप के पास आना तो मुमकिन नहीं है। बाबा रुपनाथजी कहते है कि तेरी बात सही है, मैं ही तेरे साथ चलता हूं और नेगदिया में ही धूणी रमा बाबा रुपनाथ और नियाजी साथ-साथ नेगदिया आ जाते हैं। बाबा रुपनाथ नेगदिया गांव के बाहर ही अपनी धूणी लगा लेते हैं। शंकर भगवान के अवतार बाबा रुपनाथ जी नियाजी को आशीर्वाद देकर युद्ध के लिये विदा करते हैं। और जब तक नियाजी युद्ध करते हैं तब तक नेगदिया छोड़ कर नहीं जाते हैं। हर सुबह सूरज उगने के साथ नियाजी रण का डंका बजा कर रावजी की सेना पर टूट पड़ते और कई सैनिको और सामंतो को मार डालते। रावजी के खास निजाम ताजूखां पठान, और अजमल खां पठान की १२ हजार सेना का सफाया कर नियाजी उनके सिर काट देते हैं।
हर शाम नियाजी युद्ध भूमि से वापस लौटते समय अपने गुरु बाबा रुपनाथ जी की धूणी पर आते हैं। बाबा रुपनाथजी अपने हाथ का कड़ा नियाजी की देह पर घुमाते हैं और धूणी की राख लगाकर, अपने कमण्डल में से पानी के छीटें देते है जिससे नियांजी के सारे घाव भर जाते हैं और शरीर पर कहीं भी तलवार या भाले की चोट के निशान नहीं रहते हैं। बाबा रुपनाथ कहते हैं कि ये बात किसी को मत बताना, किसी को भी इसका जिक्र मत करना। अब बावड़ी पर स्नान कर शिवजी का ध्यान करके घर जाओ। नियाजी बावड़ी पर स्नान करते हैं, शिवजी का ध्यान कर रंग महल में आते हैं। नेतुजी उन्हें भोजन करवाती है, पंखा झलती है। नियाजी अगली सुबह वापस रण क्षेत्र में आ जाते हैं और युद्ध में मालवा के राजा को मार गिराते हैं। मन्दसोर के मियां मोहम्मद की फौजो का सफाया कर देते हैं। मियां का सिर काट देते हैं और वापस बाबा रुपनाथजी के पास आते हैं। और फिर बाबा रुपनाथजी नियाजी के ऊपर अपना लोहे का कड़ा घुमाते हैं, धूणी की राख लगाते हैं, पानी के छीटें देते हैं। नियाजी के सारे घाव फिर से भर जाते हैं। ये क्रम कई दिनों तक चलता रहता हैं। रण क्षेत्र में तेजाजी उधर तेजाजी बगड़ावतों के बड़े भाई युद्ध क्षेत्र में आते हैं। जब नियाजी से युद्ध करके जाने के बाद रावजी की सेना खाना बना रही होती है, रावजी के सैनिक बाट्यो सेक रहे होते हैं। तब तेजाजी अपनी सेना के साथ युद्ध क्षेत्र में आते है उनकी बाट्या वगैरा सब बिखेर देते हैं और सेना में भगदड़ मचा कर वापस चले जाते हैं। दोनों भाईयों का ये क्रम ३-४ दिनों तक चलता रहता है।
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बगड़ावत देवनारायण फड़ भाग -16



दीपकंवर का युद्ध में काम आना



चौथा हमला रावजी रायला पर करते हैं जहां सवाई भोज की बेटी दीपकंवर बाई रावजी की सेना में मारकाट मचा देती है। दीपकंवर बाई मर्दाना वेष कवच धारण कर रावजी की सेना से घोर संग्राम करती है और उनकी काफी सारी सेनाओं को अपनी तलवार से काट डालती है। अन्त में वह दियाजी और कालूमीर से युद्ध करते हुए मारी जाती है। जिसका सिर काट कर भवानी (जयमती) ने अपनी मुण्ड माला में धारण किया था। बगड़ावतों के बड़े भाई तेजाजी को जब दीपकंवर की मौत का पता चलता है तो वह भी युद्ध में आ जाते हैं और अपने घोड़े को रावजी की फौज के सामने खड़ा कर दःेते हैं और दीयाजी और कालूमीर की फौज काट दःेते हैं। तेजाजी सात-सात कोस तक रावजी की फौज को काट डालते हैं और अपना भाला रावजी पर फेंकते हैं पर उस भाले के वार से भवानी रावजी को बचा लेती है ।

युद्ध क्षेत्र में नीयाजी
                               धर युद्धभूमि से वापिस आकर नेतुजी नियाजी को जगाती है और कहती है कि उठिए, आप के दोनों बेटे घमासान युद्ध में मारे गए हैं। जब नियाजी उठते हैं तो देखते हैं कि उनके महल की छत पर बहुत सारी गिरजें (चीलें) बैठी हुई हैं। नियाजी गिरजों से पूछते हैं कि कहो आपका यहाँ कैसे आना हुआ। गिरजें कहतीं हैं कि हमें रावजी और बगड़ावतों के युद्ध की खबर सात समुन्दर पार से लगी है। कलयुग के इस महाभारत में हम अपनी भूख मिटाने आई हैं। अगर आप हमारी भूख मिटाने का वचन दो तो हम यहाँ रुकें नहीं तो वापस जाएं। नियाजी जवाब देते हैं कि इस युद्ध में मैं बहुत लोगों के सिर काटूगां। तुम पेट भर कर खाना। और अगर तुम मेरी बोटियाँ खाना चाहती हो तो ६ महीनें बाद आना। मैं ६ महीने का भारत करुँगा (नियाजी को ६ महीने आगे तक का पहले से ही आभास हो जाता था)
नियाजी युद्ध में जाने से पहले भगवान से प्रार्थना करते हैं कि मैं महल में बहुत आराम से रहा और अगले जन्म भी मुझे इसी देश में ही भेजना और भाई भी सवाई भोज जैसा ही देना। फिर नेतुजी नियाजी की आरती उतारती है और युद्ध में जाने के लिए उनके तिलक करती हैं। नेतुजी फिर नियाजी को सवाई भोज से मिलने जाने के लिए कहती है। नियाजी, नेतुजी कि बात मानकर सवाई भोज से मिलने जाते हैं।
जब दोनों भाई गले मिलते हैं तब दोनों की आँखों में आँसू आ जाते हैं कि अबके बिछ्ड़े जाने कब मिलेगें। नियाजी कहते हैं कि अब हमारा मिलना नहीं होगा।
नियाजी फिर रानी जयमती से भी मिलते हैं और एक वर मांगते हैं कि हमारे मरने के बाद हमारा नाम लेने वाला कौन होगा? भवानी कहती है कि बहरावत का बेटा भूणा जी और सवाई भोज के वारिस मेहन्दूजी पानी देने के लिए रहेंगे। इन दोनों को तुम राज्य से दूर भेज दो, तो ये बच जाऐंगे। और तुम बगड़ावतों का नाम लेने वाला छोछू भाट रहेगा। और तुम्हारे यहाँ भगवान स्वयं अवतार लेंगे। इतना सुन नियाजी सवाई भोज के पास वापस आ जाते हैं। और उनके महल में अपनी बड़ी भाभी (सवाई भोज की पहली रानी पदमा दे) को बुलवाकर मेहन्दूजी को ले जाने का आग्रह करते हैं। पदमा दे बड़े भारी मन से अपने बेटे को नियाजी के साथ विदा करती है और यह तय होता है कि वो बगड़वतों के धर्म भाई भैरुन्दा के ठाकुर के पास अजमेर में रहेगा।
सवाई भोज उस समय मेहन्दू के साथ कुछ सेवक और घोड़े और उनके खर्चे के लिये काफी सारी सोने की मोहरें एवं काफी सारी धन-दौलत भी भेजते हैं। सवाई भोज कहते हैं बेटा मेहन्दू कई वर्ष पहले एक बिजौरी कांजरी नटनी अपने यहां कर्तब दिखाने आयी थी तब उसे हमने ढ़ाई करोड़ का जेवर दान में दिया था। उसमें से आधा तो वो अपने साथ ले गयी और आधा (सवा करोड़ का) जेवर यहीं छोड़ गयी थी वो मेरे पास रखा है। मेरे मरने के बाद अगर वो आ जाये तो तुम ये जेवर उसे दे देना और उसके नाम का यह खत भी उसे दे देना। जेवर को एक रुमाल की पोटली में बांध कर दे देते हैं और कहते हैं कि अगर वो नहीं आये तो यह धन अपने पास मत रखना इसे कोई भी जनसेवा के काम में लगा देना। कुंआ, तालाब, बावड़ी बनवा देना। इतना कहकर सवाई भोज नियाजी और मेहंदूजी को भारी मन से भेरुन्दा ठाकुर के पास भेजने के लिए विदा करते हैं। और संदेश देते हैं कि जब कभी भी बिजौरी कांजरी आए, यह जेवर उसे मेहन्दू के हाथ से दिला देना। सवाई भोज मेहन्दु जी के अलावा बगड़ावतों के ४ और बच्चे नियाजी को दे देते हैं और कहते हैं कि इन सबको भेरुन्दा ठाकुर के पास पहुँचा देना रानी जयमती को इस बारे में पता चलता है तो वो हीरा को कहती है कि नियाजी चोरी करके ४ बच्चों को ले गए हैं लेकिन मैं किसी को नहीं छोडूगी और वह अपना चक्र चला कर मेहन्दूजी के अलावा बाकी सब बच्चों के शीश काट लेती है। मेहन्दू जी भेरुनादा ठाकुर के पास अजमेर चले जाते हैं। यहां से फिर नियाजी अपनी रानी नेतुजी को साथ लेकर बाबा रुपनाथजी के पास गुरु महाराज के दर्शन के लिये रुपायली जाते हैं। और उनके पांव छूकर कहते हैं कि गुरुजी आज्ञा दो तो युद्ध शुरु करे, बाबा आशिष देवो। नियाजी बाबा रुपनाथजी की परिक्रमा लगा कर कहते हैं मेरे जैसे चेले तो आपको बहुत मिल जायेगें, मगर मुझे आप जैसा गुरु फिर नहीं मिलेगा। बाबा रुपनाथजी कहते हैं, बच्चा यह क्या कहते हो, मेरे जैसे तो बाबा बहुत मिल जायेगें मगर तेरे जैसा चेला नहीं मिलेगा। नियाजी कहते हैं कि जब मैं अगला जन्म लूं तो मुझे शेर का जन्म देना ताकि मेरे मरने के बाद आपके बिछाने के लिए मेरी खाल काम आ जाए। नेतुजी बाबा रुपनाथ से कहती है कि मेरे पति को अगले जन्म में अगर शेर का जन्म मिले तो मुझे शेरनी का जन्म देना ताकि मैं उनके साथ वन में रह कर उनके दर्शन करती रहूँ। बाबा रुपनाथ फिर नेतुजी से कहते हैं कि अगर नियाजी का शीश भवानी ले जाए तो तू इसका खाण्डा अपने साथ ले जाना और इसके खाण्डे के साथ ही सती हो जाना। बाबा रुपनाथ यह वचन नेतुजी से ले लेते हैं।
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Monday, January 27, 2020

बगड़ावत देवनारायण फड़ भाग – 15


जोधा और जगरुप का युद्ध में काम आना
दूसरा हमला रावजी नेगड़िया पर करते हैं। वहां नियाजी 6 महीने की नींद में सो रहे होते हैं। नियाजी की रानी नेतुजी हाथ में जल की जारी ले कर उन्हें जगाने आती है। लेकिन नियाजी नहीं जागते। फिर नेतुजी नियाजी की माँ लखमादे राठौड़ को नियाजी को जगाने के लिए बुलाती है। लेकिन वे भी उनको नहीं जगा पाती तब नियाजी के लड़के जोधा और जगरुप अपनी माँ को कहते हैं कि पिताजी को क्युं जगाती हो, उन्हें सोने दो हम लड़ाई करने जायेगें। माँ नेतुजी अपने बेटो को मना करती है कि अभी तुम छोटे हो ( 9 बरस के) अभी तुम्हारी युद्ध में जाने की उम्र नहीं है। इस पर जोधा और जगरुप जिद करते हैं कि हम रावजी से अकेले ही निपट लेगें। पिताजी (नियाजी) ो सोने दो, उन्हे मत जगाओ।
नेतु अपने दोनों बेटो जोधा-जगरुप की आरती करती है और उन्हें युद्ध के लिये भेजती है। जोधा-जगरुप रावजी से युद्ध करने जाते हैं। दोनों भाई रावजी की फौजों से लडाई करते हुए कई सामंतो और सरदारों को मार देते हैं और तीन दिन तक लगातार युद्ध करते रहतें हैं। जोधा-जगरुप का युद्ध देखकर भवानी हीरा को कहती है कि ये दो लड़के युद्ध करने आये हैं और रावजी की फौज के साठ हजार सैनिकों को खत्म कर दिया। यह देख रानी भवानी ने एक चक्र चलाया औरे दोनों भाइयों के माथे उतार लिये। जब रावजी ने दीयाजी से पूछा की आज की लड़ाई कैसी रही। दीयाजी ने कहा टोड़ा का रावजी आज काम आ गये और हमने सभी फौज में मरने वालों की पगड़ी और शव उनके घर भेज दिये हैं।
नेतुजी साड़ीवान से युद्ध के समाचार पूछती है, तो साड़ीवान कहता है कि आपके कुवंरों ने युद्ध तो अच्छा किया लेकिन वह दोनों भी मारे गए। जोधा और जगरुप दोनों ही शादीशुदा नहीं थे इसलिए नेतुजी जब अपने बेटों के कटे हुए सिर और धड़ो की आरती के लिये आती है, गिरजों से बात करती है और पूछती है कि तुमने मेरे बेटों की लाशों को क्यों नहीं खाया। गिरजे जोधा-जगरुप की लाशों को देखकर कहती है कि अभी इनकी मरने की उम्र नहीं थी, मगर भवानी को लाने से यह दिन देखना पड़ा। इसलिए हम इन्हें नहीं खाना चाहती। भवानी जोधा और जगरुप के सिर अपनी मुण्ड माला में धारण करती है। नेतु अपने दोनों बेटो के कटे हुए धड़ की आरती उतार कर विलाप करती है। और अपने पति नियाजी को जगाने के लिए महल में चली जाती है। अटाल्या जी और अन्य भाइयों की युद्ध में मृत्यु तीसरा हमला रावजी की सेना अटाली पर करती है जहां बगड़ावत भाई अटालयाजी अपनी एक हजार सेना के साथ रावजी के साथ युद्ध करते हैं। रावजी के छोटे भाई (तीसरे नम्बर के) आमादेजी मारे जाते हैं। रावजी की सेना से संग्राम करते हुए अटालयाजी, आलोजी भी युद्ध में मारे जाते हैं और भवानी उनका सिर काट अपने मुण्ड माला में धारण कर लेती है।
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बगड़ावत देवनारायण फड़ भाग - 14

बाबा रुनपाथ और रावजी का युद्ध



उधर रावजी अपने 52 गढ़ो के खास सामन्तो जिनमें दियाजी, कालूमीर पठान, टोडा का सोलंकी, इत्यादि के साथ अपनी सेना को रुपायली में पहला हमला (बाबा रुपनाथ पर) करने भेजते हैं। वहां बाबा रुपनाथजी अपने सभी नागा साधुओं की फौज के साथ युद्ध के लिये तैयार होते है।
बाबा रुपनाथजी रावजी की फौज को आते देख अपने पालतु कुत्तो को खुला छोड़ देते है। गाथा के अनुसार इनकी संख्या 500 बताई गई है। रावजी की फौज इन कुत्तो के हमले से घबरा जाती है। ऊपर से नागा साधुओं के हमले से भाग छूटती है। और रावजी के यहां वापस लौट आती है। उनके कई सैनिक इस लड़ाई में मारे जाते हैं।
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बगड़ावत देवनारायण फड़ भाग - 13


रावजी का बगड़ावतों के साथ युद्ध छेड़ना


जब रावजी शिकार से वापस लौटते हैं, तब महल में रानी के गहने पड़े हुए देखते है। उन्हें नीमदेजी कहते हैं कि भाई, बगड़ावत रानी सा को भगाकर ले गये हैं। ये बात सुनकर रावजी को यकीन नहीं होता और कहते हैं वो तो हमारे भायले है वो ऐसा नहीं कर सकते हैं। ं] जब चारों ओर साड़ीवान ( सवार संदेश वाहक) दौड़ाए जाते हैं कि रानी सा का पता लगाओ। रावजी को संदेश वाहक से पता चलता है कि रानी सा तो बगड़ावतों के यहां गोठांंं में है तब जाकर रावजी को विश्वास होता है कि बगड़ावत रानी को भगाकर ले गये हैं। रावजी नियाजी को एक परवाना लिखकर भेजते हैं कि भाई राणी को वापस भेज दो। नियाजी जवाब में रावजी को पत्र लिखते हैं कि हमने तो रानी शिवजी के चढ़ा दी है और आपको रानी चाहिए तो दूसरा ब्याह कर लो। दूसरा परवाना रावजी ने बाघजी को लिखा कि रानी ने ले ग्या बेटा बाघ का, नियाजी को समझा कर रानी को वापस भेजो। बाघजी ने रावजी को जवाब लिख भेजा कि रानी तो शिवजी को चढ़ा दी है। और आपको रानी चाहिए तो दूसरा ब्याह कर लो। रावजी बगड़ावतों को समझाने का खूब प्रयास करते हैं कि रानी सा को वापस राण पहुंचा दो नहीं तो अन्जाम बुरा होगा। जो भी बगड़ावतों के पूर्वज थे उनके माध्यम से (बिसलदेवजी, बाघ सिंघ जी और कई राजाओं, सामन्तों के साथ) संदेश भेज बगड़ावतों को समझाने के प्रयास किये गये मगर बगड़ावत अपनी बात पर अड़े रहते हैं।
अब रावजी एक संदेश बाबा रुपनाथ के यहां भेजते हैं कि आप के चेले बगड़ावत रानी को ले गए हैं, आप उन्हें समझाइए कि वे रानी को वापस भेज दें। बाबा रुपनाथ रावजी को जवाब देते हैं कि रानी तो अब हमारी शरण में आ चुकी है। आपको अगर लड़ाई करनी है तो पहले रुपायली पर हमला करो। बगड़ावतों तक जाने की जरुरत ही नही है। फिर बाबा रुपनाथ बगड़ावतों को संदेश भेजते हैं कि आप सब लोग लड़ाई की तैयारी कर लो। रावजी से युद्ध करना है। अब चाहे जो हो जाये, रानीजी को वापस नहीं भेजना है। सभी बगड़ावत अपने गुरु का संदेश पढ़कर जोश से भर जाते हैं। एक संदेश तेजाजी को पाटन की कचहरी में भी भेजा जाता है और तेजाजी भी युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं। लड़ाई शुरु करने से पहले बगड़ावत अपने सभी सामन्तों को सन्देशवाहक भेजकर फौज इकट्ठी कर लेते हैं और दुगने जोश से युद्ध की तैयारी के लिये अपने-अपने खैड़ो पर पहुंच जाते हैं। रानी जयमती को दिये वचन के अनुसार सभी भाईयो को अलग-अलग अपने खैड़ो से ही लड़ाई लड़नी थी।
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बगड़ावत देवनारायण फड़ भाग - 12


सवाई भोज का रानी जयमती को भगाकर ले जाना


रावजी और सारे सामन्तो को शिकार के बहाने दूर भेजकर रानी जयमती और हीरा बगड़ावतों के साथ भागने की योजना बनाती है। रावजी शिकार पर जाते समय नीमदेवजी को पहरे पर लगा जाते हैं कि रानी का ध्यान रखना। रानी हीरा से कहती है कि हीरा रावजी तो गये पर नीमदेवजी को पहरे पर लगा गये। अब इसका क्या उपाय करें। हीरा कहती है बाजार से जहर मंगवाओ और लाडू बनवाओ। जहर के लड्डू बनते हैं और भैरुजी के चढ़ाकर हीरा सब को बांट देती है। जो भी लड्डू खाता है वो 4 घंटे की नींद सो जाता है। जिस रास्ते से जाना है उस रास्ते हीरा सब को लड्डू बांटकर वापस आती है ताकि उन्हें जाते हुए कोई देख ना सके। चावण्डिया भोपाजी लाडू खाते हैं तो हीरा से कहते हैं, हीरा मैंने तो मीठा मुहं कई वर्षों बाद किया है। हीरा कहती है लाडू तो सब को दे दिये मगर नीमदेवजी की सवारी महल के सामने घूम रही है। हीरा कहती है रानी जी श्रृंगार करो और पीछे के रास्ते से बगड़ावतों के यहां चलते हैं। हीरा रेशम की डोर लेकर आती है और उसकी रस्सी बनाती है और महल की पिछले वाली खिड़की से रेशम की रस्सी डालती है जिसके सहारे दोनों महल से बाहर निकल आते हैं।
रानी और हीरा दोनों नौलखा बाग के बाहर आकर अपनी माया के प्रभाव से बाग के दरवाजे के ताले खोल देती है। ये देख कर बाग का माली रानी जी के पांव छूता है और रानी जी बगड़ावतों से मिलने अंदर जाती है।
सवाई भोज अपनी बूंली घोड़ी पर रानी जयमती को और नियाजी अपने नौलखे घोड़े पर हीरा को बैठाकर राण से भाग निकलते हैं। रास्ते में रानी सोचती है कि बगड़ावतों की परीक्षा लेती हूं और देखती हूं कि ये रावजी की सेना से मुकाबला कर पायेगें कि नहीं। रानी वहीं पर घोड़े से उतर जाती है और अपने पांव की पायल खोलकर गिरा देती है और कहती है मेरी पायल बावड़ी में गिर गयी है उसे निकालो। अपनी करामात दिखाओ नहीं तो मुझे यहीं छोड़ कर वापस चले जाओ। सवाई भोज शिव महादेव जी का ध्यान करते हैं, और पानी के ऊपर पायल तैरने लग जाती है, सवाई भोज रानी को पायल वापस दे देते हैं। जब वो वापस वहां से चलने लगते हैं तब भवानी घोड़े पर सवार सवाई भोज के कलेजे (दिल) पर हाथ रखे होती है और अपने मैल से तीतर बनाकर घोड़ी के पावों में छोड़ देती है जिससे घोड़ी चमक जाती है, और उछलती है। तब सवाई भोज की धड़कन तेज हो जाती है और रानी जयमती कहती है कि सवाई भोजजी घोड़ी के चमक जाने से ही आपका कलेजा जोर से धड़कने लगा है। आप मुझे लेकर जा तो रहे हो, मगर रावजी की विशाल सेना के सामने क्या लड़ सकोगे। तो सवाई भोज को जोश आ जाता है और वो अपनी तलवार से 11 हाथ की भाटा चट्टान को चीर देते हैं। ये देख कर रानी सोचती है कि एक ही वार से चट्टान चीर दी, रावजी का क्या हाल होगा, जब सभी 24 भाई एक साथ लड़ाई करेगें। रानी जयमती वहीं पर सवाई भोज से वचन लेती है कि रावजी से युद्ध के समय आप सभी 24 भाई अपनी सेना के साथ रावजी से एक-एक कर युद्ध करोगे। सभी भाई साथ मिलकर युद्ध नहीं करोगें। सवाई भोज रानी जयमती को ये वचन दे देते हैं कि हम साथ मिलकर युद्ध नहीं करेंगे।
सवाई भोज रानी जयमती को गोठां में लाने से पहले रातादेवरा में उतारते हैं। रातादेवरा में सवाई भोज और नियाजी भवानी को दारु पीने के लिये मनुहार करते हैं, भवानी कहती कि आप लोग माथा (सिर) देवो तो में दारु पी और कहती है कि आपके घर से मुझे बधाई के गीत गाते हुए लेने आएं तो मैं घर चलूं। जब बगड़ावत वहाँ से घर वालों को खबर देने गोठां चले जाते हैं तब वहाँ पर पोमा घासी आ जाता है और राणी से कहता है, आप मेरे साथ शादी कर लो, बगड़ावतों के यहां तो पहले से ही बहुत रानियां है। भवानी उससे बगड़ावतों के घर की सारी बातें पूछ लेती है। और बाद में नोहत्थी नाहरी बन के हुंकार करती है। पोमा घासी नाहरी को देखकर डर के मारे गिर जाता है, उसके रोटी और प्याज बिखर जाते हैं और पानी की बतूकड़ी फूट जाती है। गांव की गू महिलाएं बधाई के गीत गाते हुए रानी को लेने के लिये आती हैं। साथ में २४ भाईयों की राणीयां भी आती हैं। जब नेतूजी और दीपकवंर रानी जयमती के पास आती है तो रानी जयमती दीप कंवर से पूछती है की तू किसकी बेटी है और ये किसकी बहू। दीपकंवर बाई रानी को जवाब देती है कि मै सवाई भोज की लड़की और ये काका नियाजी की रानी नेतुजी हैं। सभी रानियाँ तो रानी जयमती के पांव छूती हैं मगर नेतूजी नहीं छूती।
जब सब औरतें रानी को लेकर गोठां पहुंचती है तो वहां पर सा माता आरती ऊतारकर नववधु का स्वागत करती है। रानीजी सा माता से कहती है कि आपने बहुत प्यार से मेरा स्वागत किया है आज तो मैं आपकी सौत बनकर आई हूँ। जब देवनारायण भगवान आपकी गोद में खेलेंगे तब मैं आपकी बहू बनकर आऊँगी। रानी जयमती को उनके महल में ले जाया जाता हैं। रानी जयमती और सवाई भोज गोंठा के महल में चौपड़ खेलते हैं।
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Wednesday, January 1, 2020

बगड़ावत देवनारायण फड़ भाग - 11


रानी जयमती की तलाश में - 4  



एक दिन रात को हीरा और रानी जयमती सवाई भोज से मिलने नौलखा बाग की ओर जा रही होती हैं, संयोग से उस दिन नीमदेवजी पहरे पर होते हैं और वो रानी की चाल से रानी को पहचान जाते हैं। रानी नीमदेवजी को देख पास ही भडभूजे की भाड़ में जा छुपती है। जिसे नीमदेवजी देख लेते हैं और हीरा से पूछते हैं कि हीरा भाभी जी को इतनी रात को लेकर कहां जा रही हो? हीरा सचेत हो कर कहती है कि बाईसा को पेट घणो दूखे है, इस वास्ते भड़भूजे के यहाँ आए हैं। यह झाड़ फूंक भी करना जानता है, बताबा ने आया हैं। नीमदेवजी को हीरा की बात पर विश्वास नहीं होता है। भड़भूजा की भाड़ में छिपी रानी को निकालते हैं और हीरा को कहते हैं कि हीरा तुझे इस सच की परीक्षा देनी होगी। हीरा परीक्षा देने के लिए तैयार हो जाती है। नीमदेवजी लुहार को बुलवाते हैं और लोहे के गोले गरम करवाते हैं। लुहार भट्टी पर लोहे के बने गोलों को तपा कर एकदम लाल कर देता है। जब लुहार लोहे के तपते हुए गोले चिमटे से पकड़कर हीरा के हाथ में देने वाला होता है तब नीमदेवजी हीरा से कहते हैं कि यदि तू सच्ची है तो तेरे हाथ नहीं जलेगें और अगर तू झूठ बोल रही होगी तो तेरे हाथ जल जायेगें। हीरा लोहे के गर्म गोलों को देखती है तो एक बार पीछे हट जाती है और रानी की ओर देखती है। फिर अचानक हीरा को लाल तपते हुए गोले के उपर एक चिंटी चलती दिखाई देती है तो वो समझ जाती है कि यह बाईसा का चमत्कार है। और वह तपते हुए गोले को अपने हाथों में ले लेती है। इस पर नीमदेवजी कहते हैं कि रानी जी के पेट में दर्द था तो भड़भूजे को ही महलों मे बुलवा लेते। इतना कहकर नीमदेवजी वहां से चले जाते हैं।
इसके बाद नीमदेवजी दरबार में रावजी के पास जाकर रानी की शिकायत करते हैं, और कहते हैं कि कहीं बगड़ावत भाई रानी को उठाकर न ले जाएं। रावजी जवाब देते हैं कि राण में आप जैसे उमराव हैं ऐसे कैसे कोई रानी को उठाकर ले जा सकता है।
रानी जयमती दूसरे दिन हीरा के हाथ बगड़ावतों को संदेश भेजती है कि आप कुछ दिन तक यहीं बिराजो, नौलखा बाग को छोड़कर कहीं मत आना जाना। महलों की ओर भी नहीं आना, नहीं तो लोग समझेगें बाईसा त्रिया चरित्र है। रानी जयमती का यह संदेश नियाजी को ही देकर हीरा वापस लौट आती है। जब रानी हीरा से पूछती है कि सवाई भोज से क्या बात हुई तो हीरा बताती है कि सवाई भोज से तो मैं मिली ही नहीं, मैं तो नियाजी से ही मिलकर वापस आ गई हूँ। तब रानी कहती है कि तूने नियाजी से बात क्यों करी? तुझे सवाई भोज से मिलने भेजा था और तू नियाजी से ही मिल कर वापस आ गई। हीरा कहती है रानी जी आपका आज मुझ पर से भरोसा उठ गया है। अब आपका और मेरा मेल नहीं हो सकता है। अब मैं आपके साथ नहीं रह सकती। रानी हीरा को मनाती है और उसकी बढ़ाई करती है। कहती है हीरा तेरे को मैं सारे श्रृंगार करवाऊगीं और हीरा को अपने कपड़े और सारे गहने देती है। मनाती है और हीरा से कहती है तू मेरा साथ मत छोड़। रानी हीरा से कहती है, हीरा यहां से कैसे निकला जाय कोई उपाय करो। हीरा कहती है रावजी का चारों ओर पहरा लगा हुआ है, क्या करें। रावजी को तो हम सूअर का शिकार करने भेज देगें। मगर पहरे का क्या करेगें? हीरा कहती है बाईसा आप पेट दुखने का झूटा बहाना करो। रानी हीरा की सलाह अनुसार ऐसा ही करती है।
हीरा रावजी के दरबार में जाकर फरियाद, फरियाद चिल्लाती है। रावजी पूछते है हीरा क्या बात हैं। हीरा कहती है दरबार बाईसा के पेट में बहुत दर्द हो रहा है और लगता है बीमारी इनकी जान लेकर ही छोड़ेगी। रावजी नीमदेवजी को कहते है भाई नीमदेव रानीजी की बीमारी बढ़ती ही जावे है। कोई अच्छा जाना-माना भोपा हो तो पता करवाओं। 6 महीनो से ये बीमारी निकल ही नहीं रही है। नीमदेवजी उडदू के बाजार में आते हैं। वहाँ उन्हें चांवडिया भोपा मिलता हैं और नीमदेवजी से कहता है कि डाकण (डायन), भूत, छोट (प्रेत), मूठ (दुष्ट आत्मा) को तो मैं मिनटों में खत्म कर देता हूं। उसे नीमदेवजी अपने साथ महलों में ले जाते हैं। नीमदेवजी हीरा से कहते हैं कि इसे ले जा और तेरे बाईसा को दिखा। हीरा भील को रानी जयमती के महल में ले जाती है। रानी अपनी माया से भोपा में भाव डाल देती है जिससे भोपा रावजी के पास आकर कहता है कि मैं रानी जी को ठीक कर सकता हूँ। भोपा ने बताया कि रानी जयमती ने भैरुजी से अपने लिए राजा जैसा वर मांगा था। उन्होनें राजा जैसा वर तो पा लिया मगर भैरुजी की जात अभी तक नहीं जिमाई। इसलिये भैरुजी का दोष लग गया। जात जिमाणी पड़ेगी। नीमदेवजी हीरा से पूछते हैं कि जात जिमाने में क्या लगेगा? हीरा बताती है की 12 मन का पूवा, 12 मणकी पापड़ी, 12मण का सुवर जिसके बाल खड़े नहीं होवे, खून निकले हुआ नहीं हो, को बाईसा पर वारकर छोड़ो तो बाईसा बचे, नहीं तो नहीं बचेगी। और यह टोटका रावजी के हाथ का ही लगेगा और किसी के हाथ का सूअर नहीं चढ़ेगा। और ये बात सुनते ही रावजी सूअर का शिकार करने के लिये अपनी सेना तैयार करने का हुकम देते हैं। उसमें सभी उमराव दियाजी, कालूमीर, सावर के उमराव और रावजी के खासम खास सरदार और 500 घुड़ सवार तैयार हुए। इतने में दियाजी ने कहा रावजी मेहलो में पहरा अच्छा लगाना क्योकि 24 बगड़ावत भाई नौलखा बाग में डटे हुए है। वो कहीं रानी सा को उठा कर न ले जाये। रावजी कहते है वो तो मेरे भाई हैं और उन्होनें ही मेरी शादी करवाई और पैसा भी उन्होने ही खर्च किया। वो ऐसा नहीं कर सकते। फिर भी रावजी शिकार पर जाने से पहले नीमदेवजी को पहरे की जिम्मेदारी सोंप कर जाते हैं।
उधर रानी जयमती अपने पसीने से एक सूअर बनाती है। उसका वजन 12 मण होता है। और अपनी माया से उसे रावजी के आगे छोड़कर कहा की हे सुवरड़ा राजाजी को नाग पहाड़ से भी आगे दौड़ाता हुआ ले जाना और 4 दिनो तक वापस आने का अवसर मत देना। इस तरह रावजी सुवर के पीछे-पीछे नाग पहाड़ से आगे निकल जाते हैं। नाग पहाड़ पहुंच कर वह माया से बना सूअर गायब हो जाता है।
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Monday, December 23, 2019

बगड़ावत देवनारायण फड़- भाग 10


रानी जयमती की तलाश पार्ट -3



रानी जयमती के लिये बनाया गया नया महल बनकर तैयार होता  है, रानी जयमती महलों में रहने आ जाती है। जब रावजी अपनी नई रानी जयमती के पास रात को सोने आते हैं, रानी उनके साथ चौपड़ पासा खेलती है और अपनी माया से रावजी को मुर्गा बना देती है और हीरा को बिल्ली बना देती है। रात भर मुर्गा बने रावजी बिल्ली से बचने से लिये इधर-उधर भागते, छिपते रहते हैं। ऐसा क्रम कई दिनों तक चलता रहता है। एक दिन रावजी के छोटे भाई नीमदेजी से पूछते हैं कि भाईसा नई रानी में इतना मग्न हो गये हो कि आपकी आंखे इतनी लाल हो गई हैं, क्या रात भर सोये नहीं थे ? रावजी कहते हैं कि नीमदे लगता है महल में कोई भूत प्रेत हैं जो रात भर मेरे पीछे बिल्ली बनकर घूमता रहता है और मुझे डराता है।
इधर राण में जयमती (भवानी) हीरा से पूछती है कि बगड़ावत आ गये क्या? हीरा जवाब देती है कि मुझे नहीं लगता कि वो आऐगें। जयमती कहती है बादलो में बिजली चमक रही है। बगड़ावतों के भाले चमक रहे हैं, बगड़ावत आ रहे होंगे । हीरा कहती है बाईसा मेरे को ऐसा कुछ नहीं दिखाई दे रहा है।
बगड़ाबत राण में रानी को लेने आ जाते हैं और नौलखा बाग में ठहरते हैं। सवाई भोज बकरियों की पाली बनाकर रानी के महलों के पिछवाड़े उन्हें चराने निकल जाते हैं और रानी जयमती को संकेत कर देते हैं कि हम आपको लेने आ गये हैं।
जैसे ही रानी जयमती को बगड़ावतों के आने की सूचना मिलती है रानी जयमती अपनी माया से अपने पसीने का सूअर बनाकर नौलखा बाग के पास छोड़ देती है। नियाजी की निगाह जब उस पर पड़ती है तो वह उसका शिकार कर लेते हैं।
वहां नौलखा बाग में नियाजी और नीमदेवजी की फिर से मुलाकात होती है। नीमदेवजी रावजी के पास जाकर बगड़ावतों के आने की खबर देते हैं।
इधर रानी जयमती हीरा को कहती है की जाकर पता करो सवाई भोज के क्या हाल हैं। जब हीरा जाने के लिए मना करती है तो जयमती हीरा को लालच देती है और अपने सारे गहने हीरा को पहनने के लिये देती है। हीरा कहती है ये गहने मुझे अच्छे नहीं लगते हैं, ये तो आपको ही अच्छे लगते हैं। जयमती हीरा को कहती है कि ये गहने पहनकर तू सवाई भोज का पता करने जा।
हीरा नौलखा बाग में बगड़ावतों से मिलने पहुंचती है जहां बगड़ावत भाई पातु कलाली की बनाई दारु पी रहे हैं। वहां हीरा के गले में नियाजी दारु का गिलास उण्डेल देते हैं। हीरा दारु पीकर बेहोश हो जाती है और रात भर नौलखा बाग में ही रहती है। बगड़ावत हीरा को जाजम(दरी)  से ढक देते हैं, ताकि कोई देख ना ले।
जब सुबह हीरा को होश आता है और वह महलों में रानी के पास लौटती है तो किसी को शक न हो इसलिए अपने साथ चावण्डिया भोपा को लेकर आती है और कहती है कि रानी के पेट में दर्द था उसको ठीक करने के लिए इसे लेने गई थी। चावण्डिया भोपा के वापस लौटने के बाद रानी जयमती हीरा को पीटती है और ईर्ष्या वश उसे खूब खरी-खोटी सुनाती है कि तू भोज पर रीझ गयी है। भोज ने रात को तुझे छुआ तो नहीं और क्या-क्या बात हुई बता। जब हीरा सारी बात सही-सही बताती है तब रानी जयमती वापस हीरा को मनाती है, उसे खूब सारा जेवर देती है।
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Sunday, December 22, 2019

बगड़ावत देवनारायण फड़- भाग 9


रानी जयमती की तलाश पार्ट -2
साडू माता कहती है कि मैं आपकी दारु यहीं मंगवा देती हूं। राण में दारु पीने मत जाओ। मैं प्याले भर यहीं पिला दूंगी। तो नियाजी फिर कहते हैं कि वचन दिया हुआ है, जाना तो पडेगा। साडू माता बगड़ावतों को जाने के लिए बार-बार मना करती हैं। साडू माता कहती है कि पर नारी को अंग लगाना अच्छा नहीं है। रावण चाहे कतना ही बलवान था मगर सीता हरण करने से उसका भी अंत हो गया। जयमती रावजी की स्री है। पर-नारी को आप भी मत लाओ नहीं तो अन्जाम बुरा होगा। साडू माता नियाजी को बताती है कि मैंने सपना देखा है कि खारी नदी के ऊपर घमासान युद्ध हो रहा है। कटे हुए माथों का ढेर लगा हुआ है। मेरी आखों से आंसू आ रहे हैं। सा माता कहती है कि मैंने भवानी को मुण्ड माला धारण किये हुए खारी नदी के घाट पर बैठे देखा है। इस पर नियाजी कहते हैं कि माताजी सपना तो झूठा होता है, सपने पर क्या यकीन करना। जब बगड़ावत साडू माता के बहुत समझाने पर भी नहीं मानते हैं तो साडू माता बगड़ावतों के गुरुजी को एक पत्र लिखती है कि गुरुजी आप के चेले गलत राह पर जा रहे हैं। आप आकर इन्हें समझाओ। बाबा रुपनाथजी पत्र का जवाब देते हैं कि साडू माता रानी को तो जरुर लाना है। नियाजी बाबा रुपनाथजी का पत्र पढ कर सबको सुनाते हैं बगड़ावतों के यहां रणजीत नगाड़ा बजने लगता है। माता साडू कहती है, बाबाजी को तो आग बुझाने के लिये कहा था इन्होंने तो और आग लगा दी है। नियाजी रानी जयमती की सुन्दरता का वर्णन साडू माता के सामने करते हैं। उनके श्रृंगार और रुप के बारे में बताते हुए उन्हें रानी पद्मनी की उपमा देते हैं। इस पर सा माता नियाजी से कहती है कि आप जाओ और रानी को लेकर आओ मैं नई रानी को अपनी बहन के जैसे समझूंगी और उसे लेकर आओगे तो उसकी आरती उतारकर हंसी-खुशी उसका स्वागत कर्रूंगी। दूसरी सभी रानियाँ साडू माता से कहती हैं कि रानी जयमती है तो बहुत खूबसूरत लेकिन है तो दूसरे की औरत।बगड़ावत राण जाने के लिए अपने घोड़ों का श्रृंगार करते हैं। सवाई भोज हीरों-पन्नों और सोने के जेवरों से सजी हुई बुली घोड़ी पर सवार होकर निकलते हैं। साडू माता बगड़ावतों को शाम के वक्त जाने के लिए मना करती है और सुबह जाने का आग्रह कहती हैं। नियाजी कहते हैं कि जाना तो है ही, आप हमारी वापसी के लिए शगुन करना और अब हमें आज्ञा दो। साडू माता की अनुमति के बाद सभी भाई घोड़ों को नचाते हुए सवार होकर गांव के बाहर इकट्ठे होते हैं और देखते हैं सभी भाई आ गये मगर तेजाजी नहीं आये। नियाजी तेजाजी को परवाना लिखते हैं कि तेजाजी आप पत्र पढ़ते ही जल्दी आ जाना हम आप पर आंच भी नहीं आने देंगे। आपको सुरक्षित वापस लायेगें। आप नहीं आये तो आपका सिर काटकर साथ ले जायेगें। समाचार सुनकर तेजाजी अपने घोड़े पर सवार होकर अपने भाइयों के साथ आ जाते हैं। और सारे बगड़ावत भाई रानी को लेने के लिए राठौड़ा की पाल पर पहुंचते हैं।
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