Gurjar History : देवनारायण कथा

Gurjar History

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Wednesday, December 25, 2019

बगडावत कथा -32


बगडावत कथा -32


भाटजी कमर में तीतर बांधकर सावर गढ़ में घुसते हैं और परकोटे के दरवाजे पर आकर चौकीदार से कहते हैं कि मैं अजमेर से आया हूं राजाजी का भाट हूं। द्वारपाल भाटजी को लेकर दियाजी के पास जाता हैं। चौकीदार जाकर दरबार में जहां दियाजी का दरबार लगा हुआ है, आकर कहता है कि अजमेर से भाट आया है। और भाटजी दियाजी की कचहरी में जाकर दुआ सलाम करते हैं। और कहते हैं मैं आपके ननीहाल अजमेर से आया हूं और साथ में राजाजी के कुंवर भी हमारे साथ शिकार खैलने के वास्ते आये हैं। गांव के बाहर टिमक्या तालाब पर बिराज रहे हैं और आपको याद किया है और आपको साथ लेकर आने को कहा हैं। सावर के जोधा दिया जी के साथ शिकार खैलने की इच्छा कुंवर जी ने की है। छोछू भाट दियाजी के नजदीक जाकर कहते हैं कि आप चालो कुंवर सा के पास, दो चार गांव और आपकी जागीर में बढ़ा देगें। दरबार में बैठे कालूमीर ने कहा कि दियाजी ये तो मुझे बगड़ावतों का भाट लगता है। यह सुनकर दियाजी भाला उठाकर छोछू को कहते है क्यों रे भाट तू बगड़ावतों का भाट है क्या ? भाट बोलता है कि मैं झूठ बोलूं तो इस जीव की सोगन्ध, मैं अजमेर के राजा जी, जो आपके मामा जी हैं, उनका भाट हूं। भाट के झूट बोलते ही एक तीतर मर जाता है। आप दो-चार गांव अपनी जागीर में बढ़वाना चाहो तो जल्दी चलो, कुंवर सा आपका इन्तजार करे रहे हैं। चालो दियाजी बुंली घोड़ी पर सवार होकर चालो सुवर का शिकार करने। दियाजी कहते हैं कि भाट जी बुंली घोड़ी पर तो मैं नहीं बैठूं। वो मनुष्य को तो अपने पास ही नहीं आने देती है। बांस के धकेले तो खल (खाना) खाती है और नली से पानी पीती है। और १२ मण की जंजीर उसके आगे पीछे के पांवों में और १२ मण की जंजीर उसके गले में बंधी हुई है और ग्यारह वर्षो से सूरज के दर्शन तक नहीं किये, बुरां (गुफा) में बंधी पड़ी है, दियाजी कहते हैं। भाट बुंली घोड़ी के तो नजदीक जाना ही मुश्किल है, सवारी कैसे करें ? भाट कहता है मैं सवाई भोज की घोड़ी के बारे में जानता हूं। उसको थोड़ी दारु पिलानी पड़ेगी और उसको समझाने का काम मेरा। दियाजी को शक होता है। भाट की और भाला उठाकर कहते है कि भाट तू बगड़ावतों का भाट तो नहीं। भाट सोगन्ध खाकर कहता है सरकार मैं झूठ बोलूं तो इस जीव की सोगन्ध और दूसरा तीतर मर जाता है। दियाजी को विश्वास हो जाता है कि भाट तो अजमेर का ही है और भाट को कहते हैं कि जाओ और बुंली घोड़ी को सवारी के लिये तैयार करो। देखे कर पाते हो कि नहीं। छोछू भाट दारु की मश्क लेकर वहां आ जाता है जहां सवाई भोज की बुंली घोड़ी बंधीं है और घोड़ी के साथ वार्ता करता जाता है और उसे मश्क से दारु डालता रहता है फिर उसे वीणा बजाकर खुश करता है। घोड़ी छोछू भाट को पहचान जाती है। भाट कहता है की है माताजी (बुंली घोड़ी देवी का अवतार होती है।) आप को थोड़ी देर के वास्ते दियाजी को अपनी पीठ पर बैठाना पड़ेगा और बाद में गांव के बाहर आते ही हम आप को छुड़ा कर गोठां (चौसला खैड़ा) ले जायेगें। घोड़ी पहले तो मना करती है कि मैंने अपनी पीठ पर सवाई भोज को बिठाया था अब उनके दुश्मनों को नहीं बिठा सकती फिर भाट के समझाने से घोड़ी मान जाती है और घोड़ी की जंजीरे खोलकर और उसका श्रृंगार कर भाट दियाजी की कचहरी के बाहर लेकर आ जाता है। घोड़ी को देखकर फिर दियाजी को शक होता है कि ये घोड़ी किसी को अपने पास तक नहीं आने देती है और ये भाट कैसे खोल कर ले आया। दियाजी भाट के ऊपर अपना भाला उठाकर कहते हैं कि भाट तूं कहीं बगड़ावतों का भाट तो नहीं है ? भाट कमर में बंधे तीतर पर हाथ लगाकर सोगन्ध खाता है कि मैं झूठ बोलूं तो इस जीव की सोगन्ध और तीसरा तीतर मर जाता है। दियाजी को विश्वास हो जाताहै कि झूठ बोलता तो अभी ये भाट यहीं मर जाता। और दियाजी बुंली घोड़ी पर सवार होकर पहले अपने महलों में आते हैं और रानियों से (दियाजी के चार रानियां होती है।) कहते हैं कि मैं अजमेर से पधारे कुंवर के साथ शिकार खैलने जा रहा हूं। दियाजी जैसे ही रवाना होने के लिये तैयार होते हैं अपशगुन होने लग जाते है और रानियां उन्हें जाने के लिये मना करती है कि धणीजी आप नहीं जाओ शगुन अच्छे नहीं है। और दियाजी वापस घोड़े से नीचे उतर जाते हैं। भाट देखता हैं कि बड़ी मुश्किल से तो चलने को तैयार हुए और ये फिर रुक गये। भाट दियाजी से कहते हैं सरकार कुंवर सा आपका इन्तजार कर रहे हैं। आप चलो आपकी जागीरी में दो-चार गांव बढ़ा देगें। शगुन वैसे ही अच्छे हो जायेगें। और दियाजी घोड़े पर चढ़कर वापस चलने लगते हैं। रानियां फिर से दासियों के हाथ कहलवाती है कि धणी जी अभी मत जाओ शगुन अच्छे नहीं है। आज खाली घड़ा पनिहारियां मिली और काला वलदा घोड़ा सामने से आ रहा है। शगुन खराब हो रहे हैं। भाट कहता है दियाजी बुरा नहीं मानो तो एक बात कहूं, सरकार मेरे भी दो औरतें हैं और यदि मैं कहीं जाता हूं तो औरतें जाने के लिये मना करती हैं तो मैं तो उनको पीट देता हुं। शगुन अच्छे हो जाते है। अभी आया था तब भी ऐसा ही हुआ और मैं तो पीट कर आया शगुन वैसे हीअच्छे हो गये। दियाजी भाट के बहलावे में आ जाते हैं और महलों में जाकर घोड़ी के ताजणे से अपनी रानियों को पीटते हैं। रानियां रास्ता छोड़ देती हैं। दियाजी बुंली घोड़ी पर सवार होकर चल पड़ते हैं। और भाट से कहते हैं भाट कहीं तूं झूठ तो नहीं बोल रहा है, कहीं तू बगड़ावतों का भाट तो नहीं भाट जल्दी से बोलता है सरकार झूठ बोलूं तो इस जीव की सोगन्ध और चौथा तीतर भी मर जाता है। और भाट सोचता है कि यदि अब झूठ बोलना पड़ा तो मैं तो मर ही जाउंगा।
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Sunday, December 15, 2019

श्री देवनारायण भगवान जप मंत्र


श्री देवनारायण भगवान जप मंत्र

ॐ नमों देवनारायणाय ,
सर्व मनोरथ पूर्णाय ।
अनन्त दुख भंजनाय ,
भोज नन्दाय नमो नमः ।
नमो देवनारायणं ,
सर्वत्र सदा सहायकम् ,
भक्तानामभय भंजनम् ,
भोग मोक्ष फलदायकम् ॥
ॐ नमो देवनारायण नमो नमः

भक्त इस मंत्र का जाप प्रतिदिन पातः 108 बार अवश्य करें!


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आरती श्री देवनारायण भगवान


आरती श्री देवनारायण भगवान 
आरती श्री देवनारायण भगवान की आरती करू देव धणी राया,
 मेंहदु भूणा मदन सिंह और कान भइंग के भाया टेर ॥
मालासेरी मथुरा बन गई देव जन्म तहां पाया ।
नन्दमहर के कृष्णचन्द्र जी मालासेरी मे देव कहाया,
सुखा डुंगर हरिया होया मोर मल्हार मचाया,
 सवाईभोज की भक्ति सुधारी मालासेरी मे हर्ष कराया,
 हो नीले असवार नारायण माली में आया,
 पत्थर हर को शीश झुकाया वृक्षां हर्ष मनाया,
 सवाईभोज देमाली दाता फरना जोधपुरिया में आया,
 निशदिन हरि का होता उत्सव मेला भरे है सवाया,
 सुख सम्पति दो बुद्धि चौगुणी मेटो यमका दाया,
 भैरू राम तुम शरणागत चरणकमल चितलाया॥



समस्त भक्त श्री देवनारायण चालिसा का पाठ प्रतिदिन प्रात:काल अवश्य करें ।

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श्री देवनारायण भगवान चालीसा

श्री श्री 1008 भगवान देवनारायण चालीसा
 : : प्रारम्भः :
 दोहा 
ॐ नमो गणपति गुरू , नमो सरस्वती माया 
देव सुयशवर्णन करूँ , कण्ठ विराजोआय
 - चौपाई - 
नमो देव नारायण स्वामी ।घट घट के प्रभु अन्तर्यामी
जगत उजागर सब गुण । सागर देवनारायण नटवर नागर ॥ 
जय जय जय भक्तन हितकारी इच्छा पूरण करो हमारी  
भोग मोक्ष के दाता देवा । निस दिन करूँ आपकी सेवा ॥ 
दे सत पंथ कुपंथ निवारो । किरपा कर भव पार उतारो ॥ 
अधम उधारण नाम तुम्हारा ।भक्त मनोरथ पूरण हारा  
धर कर संत रूप यदुराया । साडू माता को याचन आया ॥
 करत स्नान साडुमाता सुन आई । अपने घर खुद भिक्षा लाई॥
प्रेम विवश ज्यों की त्यों धाई । बिना वस्त्र पहने चली आई  
नग्न देख प्रभु संकुचे मन माई । पीठ फेरली जब यदुराई  
साडूमाता यो वचन उचारा । तुम हो जगत पिता करतारा ॥ 
मैं बालक तुम हो पितु माता । नग्न देख प्रभु क्यो शरमाता ॥ 
सुनत बचन देखा भगवन्ता । बाल बढ़ाय तन ढ़का तुरन्ता  
ले भिक्षा यों कहत मुरारी । मांगहु वर इच्छा अनुसारी ॥

जो तुम स्वामी देना चाहोआप समान पुत्र बक्षाओ ॥
मम समान और कौ भोरी । मैं सुत होहुँ मात हित तोरी ॥
मैं छलने आया था तौही । उलटा छला मात ते मोही ॥
नापा साडुमात को मारण धाया । उसी समय प्रकटे यदुराया ॥
आम्बा निम्बा मरे सिरदारा । जिन्दा करया आप किरतारा ॥
किशना खाती का कोढ़ हटाया । कर दीन्ही कंचन सी काया ॥
प्रकटया जब प्रभु मालासेरी माहीराण नगर सारी थर्राई ॥
मारण विप्र आपको आया  संग आपके भुजंग पाया ॥
दुजा विप्र आया शैताना । बने आप उसी वक्त जवाना ॥
तीजा विप्र आया कर रीसा । वृद्ध रूप धरिया जगदीशा ॥
काल भैरव असुर बड़धारी । वश मे किया आप गिरधारी ॥
मालवा देश माहि गोविन्दा छोछु भाट को किना जिन्दा ॥
धारा नगरी राजा की बाई । पीपलदे शुभ नाम कहाई ॥
ताके कोढ़ नशाये आपा । अखिंया खोली हरे सन्तापा ॥
भुणा जी को लेने ताई । छोछु भाट को जवान बनाया ॥
भुणा जी को कीना वीरा  टुट पड़या जुड़ा जंजीरा ॥
आप धणी देमाली आया । बीला जी का कोढ़ हटाया ॥
वैधा नाथ की धुणी आया । बहु कोढ़िन का कोढ़ हटायाद ॥
जैतु का सब संकट मेटा । इच्छा पुरी दीन्हा बेटा ॥
लाला था इक जात बलाई । उसकी आप दो देह बनाई ॥
 दीनो के रक्षक कहलाओ म्हारे ताई क्यो शरमाओ ॥
आशा पूरण करो हमारी । अरजी सुणयो बेग मुरारी ॥
मनोकामना पूरण किज्यो । अष्ट सिद्धि नव निधि दीज्यो ॥
कई मोहि मारे तानालज्जा तुम राखो भगवाना ॥
हंसी जो मेरी करवासी । उध्द बिड़द आपकी जासी ॥
 आप हमारे गुरू पितु माता  आप ही मित्र द्रव धाता ॥
आप कृपा बुद्धि बल पाऊँ । दाता तुम कह जाचन जाऊँ ॥
जय जय जय भुणा जी के भ्राता । कुमति निवारो सुमति दाता॥
 दुष्टो को अब बेग खपाओ । धर्म ध्वजा जग में फहराओ ॥

-:दोहा:-
चालिसा यह प्रेम से जो नित पढ़े प्रभाता ।
मनोकामना पूरसी श्रीदेमाली नाथ ॥
तन - मन से शनिवार को पाठ करें चालिस ॥
भैरूराम सब मिटे सुख हो विश्वा बीस ॥



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Monday, December 2, 2019

बगडावत कथा -31


बगडावत कथा -31


शेर देवनारायण व छोछू भाट के सामने आकर खड़ा हो जाता है। भाट डर केमारे उछल कर ऊपर एक पलाश के पेड़ पर चढ़ जाता है। देवनारायण शेर से कहते हैं कि भाई तुमने हमारा रास्ता क्यो रोका ,हमें जाने दो। शेर कहता है कि मैं तुम्हें खाउंगा अगर बचना चाहता हैं तो पहले मुझसे लड़ना होगा। देवनारायण कहते हैं शेर तू तो है मांसाहारी जीव। मैं तुझे अपने शस्त्र से नहीं मारूंगा। ऐसा कर पहले तूम नहा कर आओमैं तुम्हारा  यहीं पर इन्तजार कर रहा हूं। शेर नदी में  नहा कर आता है फिर शेर देवनारायण से कहता है मैं भी आपसे नहीं लडूंगा। आपने तो चमड़े कि जूतियां पहनी हैउसे खोल कर मुझसे लड़ो। देवनारायण अपने जूते खोल कर अपनी तलवार  के एक ही वार से शेर का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। फिर भाट पेड़ से नीचे उतर कर कहता है कि अभी शेर नहीं मराइसके प्राण तो नाभी में है। और अपनी कटार निकाल कर शेर की नाभी में मारता है और कहता है कि यह अब यह  मर गया  है। देवनारायण यह देख कर भाट पर हंसते हैं। वहां से देवनारायण और छोछूभाट सावर की तरफ चलते हैसावर के बाहर एक टिमक्या नामक तालाब होता हैवहां आकर देवनारायण बैठ जाते हैं और भाट से कहते हैंबाबा भाटजी आप जाकर कोई भी बहाना बनाकर दियाजी को यहा बुलाकर लाओ। भाट कहता हैदियाजी मेरे को वहीं खतम कर दे तो। और उन्हें बाहर लाने के लिए तो मुझे झूठ बोलना पड़ेगा। झूठ बोलूंगा तो वैसे ही मर जाउंगा देवनारायण भाट को चार तीतर बनाकर देते हैं और कहते हैं कि भाटजी आप चार बार झूठीं कसम खा सकते हो। इन तीतरों को आप अपनी कमर में बांध लोऔर जहां झूठ बोलना पड़े वहीं तीतर पर हाथ लगा कर कहना कि मैं झूठ बोलू तो इस जीव की कसम और एक तीतर मर जायेगा। आपको कुछ नहीं होगा। और दियाजी से कहना की अजमेर के राजाजी के लड़के सुवर का शिकार करने के लिये आये हुए हैं। और गांव के बाहर डेरा डाल रखा है। ऐसा बोलकर दियाजी को साथ लेकर झट आना।

Wednesday, November 20, 2019

बगडावत कथा -30


बगडावत कथा -30




भैंसासुर दानव जाकर देवनारायण को ललकारता है। देवनारायण अपनी तलवार से भैंसा सुर का वध कर देते हैं। लेकिन भैंसा सुर दानव के रक्त की बूंदे जमीन पर गिरते ही और कई दानव पैदा हो जाते हैं। यह देख देवनारायण अपने बायें पांव को झटकते हैंउसमें से ६४ जोगणियां और ५२ भैरु निकलते हैं। देवनारायण उन्हें आदेश देते हैं कि मैं दानवो को मारूंगा और तुम उनके खून की एक भी बूंदजमीन पर गिरने मत देना। सभी जोगणियां और भैरु अपना खप्पर लेकर तैयार हो जाते हैंऔर देवनारायण एक-एक दानव का संहार करते जाते हैं। भैंसा सुर दानव व अनेक दानवों के मारे जाने की खबर बिसलदेव जी को लगती है तब बिसलदेव जी देवनारायण को गरड़ा घोड़ा देते हैं जो अपने ऊपर किसी को भी सवारी नहीं करने देता था और आदमियों को खा जाता था। देवनारायण उस घोड़े पर बैठकर वहीं एक पत्थर के खम्बे को तलवार से काट कर दो टुकड़े कर देते हैं। देवनारायण का बल देखकर बिसलदेव जी घबरा जाते हैं और दौड़ते हुए देवनारायण के पास आकर कहते हैं भगवान मुझसे गलती हुईक्षमा करें। और बहुत सा धन देकर देवनारायण को वापस खेड़ा चौसला रवाना करते हैं। इसके बाद देवनारायण और मेहन्दू जी भाट से पूछते हैं कि हमारा क्या-क्या सामान कौन-कौन ले गया है और उसे कैसे लेकर आना है भाटजी उन दोनों को बताते हैं कि सवाई भोज की बुंली घोड़ी सावर के ठाकुर दियाजी के पास हैउसे वापस लेकर आना है। ये बात सुनकर मेहन्दू जी कहते हैं कि मैं अभी जाकर सांवर से बाबासा की घोड़ी छुड़ा कर लाता हूंऔर छोछू भाट को साथ लेकर चल देते है। मेहन्दू जी मानकराय बछेरा पर सवार हो और छोछू भाट फुलेरे बछेरे पर सवार होकर सावर के लिये निकल पड़ते हैं। आगे एक जगह जाकर रुकते हैं जहां से सावर के लिए दो रास्ते फटतें हैं। मेहन्दू जी भाट से पूछते हैं भाटजी कौनसे रास्ते जाना चाहिये। भाट कहता है सरकार एक रास्ता एक दिन का और दूसरा रास्ता तीन दिन का है। एक दिन वाले रास्ते पर खतरा है और तीन दिन वाले रास्ते पर कोई खतरा नहीं है। आप हुकम करो उसी रास्ते चलते हैं। मेहन्दू जी कहते हैं कि अपने पास शस्र हैखतरा होगा तो निपट लेगें। और एक दिन वाले रास्ते चल पड़ते हैं। आगे घना जंगल आता हैं। वहां भगवान शिव और पार्वती जी दोनों विराजमान होते हैं। पार्वती जी छल करने के लिये नो हाथ लम्बा शेर अपनी माया से बनाकर मेहन्दू जी के सामने छोड़ देती है। मेहन्दू जी शेर देखकर घबरा जाते हैं कि इतना बड़ा शेर तो कभी देखा नहीं और वो पीछे हट जाते हैंऔर वापस खेड़ा चौसला लौट जाते हैं। जब मेहन्दू जी खाली हाथ वापस आते हैं तब देवनारायण छोछू भाट को लेकर अपने नीलागर घोड़े पर सवार हो सांवर के रास्ते चल पड़ते हैं। रास्ते में वहीं जाकर रुकते हैं जहां दो रास्ते अलग-अलग दिशा में जाते हैं। देवनारायण भाटजी से पूछते हैं बाबा भाट कौनसे रास्ते जाना चाहिये। छोछू भाट कहता है एक रास्ता एक दिन का है जिसमें खतरा ही खतरा हैदूसरा रास्ता तीन दिन का है। देवनारायण कहते है भाटजी हम तो एक दिन वाले रास्ते ही जायेगेंऔर वो आगे चलते हैं। आगे घना जंगल आता है जहां शिवजी आंखे बंद किये ध्यान में लीन है और पार्वती जी शिव के पांव दबा रही है। पार्वती जी देखती है कि देवनारायण आ रहे हैं और वह शिवजी से कहती है कि भगवान मैं तो इनकी परीक्षा लूंगी। शिवजी मना करते हैं कि ये तो स्वयं नारायण हैं आपका शेर मारा जाएगा। पार्वती जी नहीं मानती हैं और वो अपने शेर को देवनारायण के आगे छोड़ देती है।

बगडावत कथा -29


बगडावत कथा -29




तलावत खां ने राणाजी को कैद कर अपने साथ ले जाते समय रास्ते में शोभादे कोजो पुरोहित की लड़की होती हैउसको भी पकड़ लिया। खरनार के बादशाह को रावजी ने कहा तू शोभादे को छोड़ दे। बादशाह ने कहा कि मैं शोभादे को एक शर्त पर छोड़ दूंगातुम मेरा निकाह तारादे से करा दो। बादशाह एक लोहे का पिंजरा बना कर रावजी को बन्द कर लेता है और शोभादे से निकाह कर लेता है। और उन दोनों को साथ लेकर खरनार वापस चला जाता है। जब तारादे को पता चलता है कि तलावत खांबाबासा (रावजीको कैद कर ले गया है तब तारादे सांडीवान के हाथ भीलों की खाल में अपने भाई भूणाजी को संदेश भेजती हैं कि भूणाजी मैं बहुत बीमार हूं और अगर आखिरी समय मुझसे मिलना हो तो जल्दी से आ जाओ। तारादे दूसरा परवाना दीयाजी और कालूमीर को लिखती है कि बाबा रावजी को खरनार का बादशाह पकड़ ले गया है। उधर भूणाजी धाधूं भील को मारकर वहां से अपनी बोर घोड़ी को छुड़ाकरसाथ लेकर राण वापस आते है। तारादे भूणाजी को सारी बात सुनाती है कि तलावत खां सात संमुदर पार रावजी को कैद कर ले गया है। विनती करती है कि उन्हें छुड़ाकर लायें। भूणाजी तारादे को कहते हैं कि अगर तू मुझे भीलमाल में ही पूरा समाचार लिख भेजती तो मैं बादशाह को रास्ते में ही रोक लेता,लेकिन तूने तो अपनी बीमारी का समाचार भेजा था। और फिर रावजी के सारे उमराव तो यहीं वापस आ गए थे। उन्होनें तलावत खां को क्यों नहीं रोका तारादे तब भूणाजी को बताती है कि वे सब तो महल में छिप कर बैठ गए थे। इस पर भूणाजी कहते हैं कि तारादे अब तक तो तलावत खां ने उन्हें मार दिया होगा। अब जाने से क्या फायदा। और सात संमुदर पार इतनी सारी सेना हाथी घोड़ो को लेकर जाना भी मुमकिन नहीं है। राणी सांखली भूणाजी को ताना कसती है कि भूणाजी आप मेरे जाये नहीं हो इसलिये आप नहीं जाना चाहते हैं। आप को राण का राज ज्यादा प्यारा है। राणी सांखली का उलाहना सुनकर भूणाजी जाने के लिये तैयार हो जाते हैं और बहादुर सैनिको का चुनाव करउमरावोंसरदारों और राजाओं को इकट्ठा करते हैं। दीयाजीकालूमीरटोडा के सोलंकी और पिलोदा ठाकुर को संदेश भेजते हैं कि रावजी को खरनार के बादशाह की कैद से आजाद कराने के लिए हम सबको साथ-साथ काबुल चलना होगा। भूणाजी तलावत खां खिलजी से युद्ध करने के लिये राणी सांखली से विदाई लेते हैं।वह भूणाजी की आरती करती है और तिलक लगा कर विदा करती हैं। भूणाजी की फौज खरनार के बाहर समुद्र के किनारे पहुंच जाती है। भूणाजी अपनी बोर घोड़ी को कहते हैं कि हम दोनों को यह समुद्र लांघकर अकेले ही खरनार पहुंचना होगा। इतने सारे सैनिक समुद्र लांघ कर कैसे जाऐंगे घोड़ी कहती है कि भूणाजी गढ़ कोटे होते तो मैं जरुर चढ़ जाती मगर पानी तो मैं नहीं लांघ सकती। तब भूणाजी बन्ना चारण से कहते हैं कि मैंने माताजी को वचन दिया है तो बाबाजी को छुड़ाने तो जाना ही पड़ेगा। लेकिन इस समुद्र को कैसे पार किया जाए। बन्ना चारण कहता है भूणाजी भगवान देवनारायण का ध्यान कीजिए। वे ही इस समस्या को हल करेंगे। भूणाजी स्नान-ध्यान कर देवनारायण को याद करते हैं। देवनारायण भूणाजी की सहायता के लिए भैरुजी को भेजते हैं। भैरुजी आते हैं और पानी में पत्थर का रास्ता बना देते हैं। भूणा जी की फौज पानी के ऊपर के रास्ते पर चल पड़ती है। सात समुद्र को पार कर भूणा जी अपनी फौज के साथ खरनार पहुंच जाते हैं। भूणाजी खरनार के बादशाह पर हमला कर महल में जाकर उनको पकड़ लेते हैं। भूणाजी खरनार के बादशाह को मारने ही वाले होते हैं कि बीच में शोभादे आ जाती हैं और भूणाजी से कहती है कि दादा ये जैसे भी हैं अब मेरे पति हैंआप इनको छोड़ दीजिए। भूणाजी तारादे की तरह शोभादे को भी अपनी बहन मानते थे इसलिए खरनार के बादशाह को माफ कर जीवित छोड़ देते हैं। और रावजी को कैद से छुड़ाकर वापस राण की तरफ रवाना होते हैं। जब भूणाजी रावजी को साथ लेकर राण पहुंचते हैं तो रानीजी भूणाजी और रावजी की आरती करती हैं। राण में वापस खुशियां लौट आती हैं।राता कोट में घी के दिये जल उठते है इधर अजमेर में जब राजा बिसलदेव जी को पता चलता है कि देवनारायण ने मालवा से वापस आकर खेड़ा चौसला नामक गांव बसा लिया है तब वह बहुत ही नाराज होते हैं और सांड़ीवान के हाथ देवनारायण के नाम संदेश भेजते हैं कि मेरी आंखों के सामने पले बड़े बालक-टाबर ने गांव बसा लिया और हमको खबर भी नहीं करी। अब आकर इसकी करनी भरो और साथ ही यह भी लिखते हैं कि मेहन्दू जी को हमने छोटे से बड़ा किया था और इसको बटूर के थानेदार बनाया थाइसके पीछे जो खर्चा हुआ था वो भी हमें लौटाओ। देवनारायण बिसलदेव जी का संदेश पढ़कर छोछू भाट को लेकर अजमेर की ओर रवाना होते हैं। जैसे ही देवनारायण के घोड़े नीलागर के पांव की टांपे अजमेर शहर में पड़ती हैं वैसे ही बिसलदेव जी का राज धूजने (हिलनेलग जाता है। देवनारायण बाहर ही रुक जाते हैं और छोछू भाट अजमेर की कचहरी में जाकर बिसलदेव को बताता है कि देवनारायण पधारे हैं। देवनारायण फिर अजमेर के महल का कांगड़ा तोड़ते हैं। बिसलदेवजी देखते हैं कि देवनारायण तो बहुत बलवान हैंकहीं ये महलों में आ गये तो महल टूट जायेगा। वो अपने दानव भैंसा सुर को बुलाते हैं और कहते हैं कि भैसा सुर एक ग्यारह वर्ष का टाबर नीलागर घोड़े पर सवार अजमेर में आया हैजाकर उसे खा जाओं।


Tuesday, November 19, 2019

बगडावत कथा -28


बगडावत कथा -28


खेडा चौसला आकर मेहन्दू जी देवनारायण से मिले। देवनारायण से मिलने के बाद मेहन्दू जी साडू माता से भी मिले क्योंकि मेहन्दू जी देवनारायण के बड़े भाई थे इसलिए साडू माता ने उनको राजगद्दी सौंप दी और उनका राजतिलक कर दिया। फिर दोनों भाईयों ने साडू माता और छोछू भाट से सलाह लेकर तेजाजी के बेटे मदनो जी को संदेश भेजा और उन्हें भी खेड़ा चौसला बुला लिया। उधर भूणा जी मेहन्दू जी से मिलकर सीधे राण में पातु के पास आते हैं और पिछली सारी बात पूछते हैं। पातु बताती है कि हां तुम बगड़ावतों के लड़के हो यह सही है। अब भूणा जी के दिल में अपने बाप का बदला लेने की भावना जाग जाती है। भूणाजी पातू कलाली के यहां से सीधे दरबार में जाकर अरज करते हैं कि बाबासा मेरे को इजाजत दो मैं भीलों की खाल को फतेह करने जाना चाहता हूं। वहां एक बहुत अच्छी बोर घोड़ी हैउसे लेकर आना है। रावजी सोचते हैं कि इसे कहीं पता तो नहीं चल गया। लगता है मेहन्दू ने इन्हें सब कुछ बता दिया। रावजी कहते हैं बेटा भूणा भीला की खाल में खतरा है। वहां ८० हजार भीलो की सेना है। उनसे वहां लड़ाई में जीतना बहुत कठिन काम है। भूणाजी कहते है बाबासा मैं तो जा रहा हूँ भीलों का मुझे कोई डर नहीं हैमेरे को तो बोर घोड़ी चाहिये। रावजी सोचते है जाना चाहता है तो जाने दो। खुद--खुद ही मर जायेगाअपने रास्ते का कांटा साफ हो जायेगा। रावजी भूणाजी के साथ दियाजी और कालूमीर पठान कोऔर उनके साथ १७,००० सैनिक और तौपेंगोला-बारूद देकर भेजते हैं। भूणाजी भीलों की खाल में जाकर भीलों से अपने बाप का बैर लेने के लिये धांधू भील को संदेश भेजते हैं कि धांधूजी हमारी बोर घोड़ी वापस कर हमारे सामने माफी मांगों नहीं तो युद्ध करने को तैयार रहो। मैं मेरे बाबासा (बगड़ावतका बैर लेने आ रहा हूं। धांधू भील भूणाजी को संदेश भेजते हैं कि भूणा तेरा बाप को रण में मैंने मारा था और अब तू भी मरने के लिये तैयार हो जा । भीलमाल ठाकुर भूणा को कहते हैं कि तेरे बाप के खातिर हमारा धणी खारी के युद्ध में मारा गया। अब तू घोड़ी लेने चला आया। सारे के सारे भील भूणा पर चढ़ आते हैं। दोनों में घमासान युद्ध हो जाता है और युद्ध ५ महीने तक चलता है। जब भीलों की सारी फौज आ गई तब कालूमीर और दीया जी तो डर के भाग गयेसब भील १७ कोस तक भूणा जी घेर लेते है। भूणा जी समझ जाते हैं कि रावजी की फौज तो साथ नहीं दे रहीं है यह युद्ध तो अपने बलबूते पर ही लड़ना होगा। उधर राण में रावजी को तलावत खां खिलजी का युद्ध का संदेश मिलता है। तलावत खां खिलजीखरनार के बादशाह का संदेश पढ़ कर रावजी घबरा जाते हैं। सोचते हैं कि उनके खास उमराव तो भूणाजी के साथ भीलों की खाल में लड़ाई कर रहें हैंतलावत खां का क्या करे रावजी ने पहले तलावत खां को बगड़ावतों से युद्ध के समय कहा था कि युद्ध जीतकर दीपकंवर बाई से आपका विवाह करवायेगें। मगर दीपकंवर बाई तो युद्ध में मारी जाती है। तलावत खां उस समय तो वापस लौट जाता हैं मगर फिर रावजी को संदेश भेजता हैं कि दीपकंवर न सही आपकी बेटी तारादे से मेरा विवाह(निकाहकरा दोनहीं तो मेरे साथ युद्ध करो। मैं तुम्हें अपने साथ कैद कर के ले जाउंगा। रावजी तलावत खां के डर से तारादे को राताकोट में छिपा देते हैं और कहते है कि कुछ भी हो तुम यहां से बाहर मत निकलना। तलावत खान अपनी सेना के साथ राण पर चढ़ाई कर देता हैं। बहुत ढूंढने पर भी तलावत खां को तारादे कहीं नहीं मिलती है। फिर बादशाह तलावत खां नौलखा बाग में छुपकर रावजी के आने का इन्तजार करने लगा। रावजी का ग्यारस (ग्यारस का वृतनजदीक आ गया था। रविवार के दिन रावजी जब ग्यारस को व्रत खोलने नौलखे बाग में गये वहां बादशाह तलावत खां ने रावजी को कैद कर लिया।

बगडावत कथा -27


बगडावत कथा -27


जब राजा बिसलदेव को पता चलता है कि मेहन्दू जी ने बिजौरी को जेवर दिये हैं तो वो बहुत नाराज होते हैं। और उनको मरवाने की साजिश करते हैं। मेहन्दू जी को मारने की साजिश के लिये राण के रावजी के यहां संदेश भेजते हैं कि सवाई भोज का लड़का मेहन्दू जी मेरी आंख में कांटे की तरह चुभ रहा है। राण के रावजी का संदेश आता हैवो लिखते है कि भूणाजी भी मेरे को काला भुजंग नाग लगता है। ये कहीं मेरे से अपने बाप का बैर न ले ले। रावजी वापस लिखते है कि मेहन्दू जी को शिकार के बहाने रोहड्यां के बीहड़ में भेज दोआगे मैं देख लूंगा। राजा बिसलदेव जी साडीवान भेज कर मेहन्दू जी को सूचना देते हैं कि मेवाड़ की भूमि पर नाहर (शेरबहुत हो गये। आते जाते लोगो को खा जाते हैं। प्रजा के रखवाले तो आप ही हो। शिकार खेले भी बहुत दिन हो गये हैं। रोहड्यां का बीहड़ में जाइए और शेरों का शिकार कर लीजिए। मेहन्दू जी बटूर से अजमेर आये तो पहले अगड़ पर हाथियों का मुकाबला कर प्रवेश किया। वहां से अपने मानकराय बछेरे पर सवार हो ५०० घुड़ सवार लेकर रोहड्यां के जंगल में शेरों के शिकार के लिये निकल जाते हैं। इधर से रावजी भूणाजी को लेकर बीहड़ में आ जाते हैं और वचीनी की बुरज पर आकर अपने डेरे डाल देते हैं। भूणाजी दातुन कर रहे होते हैं। वहां उनको तड़ातड़ गोलियां चलने की आवाज सुनाईं देती हैं। जहां मेहन्दू जी शेरों का शिकार कर रहे होते हैं। रावजी कहते हैं कि भूणा ये कौन है जो अपनी रियासत में अपनी इजाजत के बगैर शिकार खेलने आया हैं जाओ और उसे मेरे पास पकड़कर ले आओ। सामना करे तो उसे मार डालना या उसे कैद करके दरबार में हाजिर करना। इतना कहकर रावजी तो वापस राण में आ जाते हैं। भूणाजी अपनी सेना में बन्ना चारण को साथ लेते हैं उसे सेना का सरदार बनाते हैं। बन्ना चारण कहता है सरकार हमला करने से पहले उसे संदेश तो भेज दो ताकि वो भी तैयार हो जाये। पीछे से हमला करना आप जैसे मर्दों का काम नहीं है। भूणाजी सांडीवान के हाथ संदेश दिलाते है कि मेरा नाम राजकुमार भूणा हैबिना आज्ञा से यहां शिकार खैलने की सजा देने आ रहा हूं। मेहन्दू जी के पास सांडीवान संदेश लेकर आता है। मेहन्दू जी संदेश पढ़ते है और सोचते की भूणाजी तो मेरा भाई है। क्या भाई-भाई को मारेगा। जरुर इसमें बाबासा (बिसलदेवकी कोई चाल हैअपने रास्ते से मुझे हटाने की। मेहन्दू जी सांडीवान के साथ भूणाजी को संदेश भेजते हैं। कहते हैं कि आप पधारो में आपसे गले मिलने के वास्ते इन्तजार कर रहा हूं। हम दोनों मिलकर साथ मे माताजी की पूजा करेगें।सांडीवान भूणाजी के पास संदेश लेकर आते हैं। भूणाजी संदेश पढ़ते हैं कि वो तो मुझसे गले लगने के लिये इन्तजार कर रहे हैं। भूणाजी बन्ना चारण को कहते हैं कि बन्ना हमने उसे युद्ध करने का संदेश भेजा और वो हमें संदेश भेज रहा है कि हम साथ मिलकर माताजी की पूजा करेगें। बन्ना पूछते है कि कौन है वो। भूणाजी कहते हैं कि मेहन्दू है कोई। बन्ना पहचान जाता है और कहता है कि सरकार ये तो आपका भाई है। मेहन्दू सवाई भोज का लड़का है। ये क्या कहते हो बन्नामेरे बाबासा तो रावजी है। ये मेरा भाई कहां से आ गया फिर बन्ना सारी बात बताता है कि बगड़ावतों के मरने का बाद रावजी और उनके साथियों ने आपको भी मारने की कोशिश की मगर आप बच गये और रावजी आपको अपना बेटा बनाकर साथ ले आये। और इस बात का भूणाजी को सबूत देता है कि आपकी चंटी अगुंली कटी हुई है। रावजी का और आपका खून मिलाकर रावजी ने आपको बेटा बनाया है और आपको खाण्डेराव नाम दिया। ये बात सुनकर भूणाजी अपने बछेरे पर सवार होकर मेहन्दू जी से मिलने आते हैं। जहां दोनों भाई गले मिलते हैं और एक दूसरे का हाल पूछते हैं। मेहन्दूजी उन्हें सारी बात बताते हैं कि अपने खानदान के मरने के बाद अपना खजाना कौन-कौन लूट कर ले गये हैं।और बाबासा की बोर घोड़ी को धांधू भील ले गया है। सुना है उसके सवा मण की बेड्या गले में डाल रखी हैं और कैद करके रखी हुई है। जहां उसकी बड़ी दुर्दशा हो रही है। सबसे पहले आप उसे छुड़ाओ। और सारी बात मेहन्दूजी भूणाजी को बताकर रोहड़िया की बीहड़ से सीधे खेड़ा चौसला आ गए।

बगडावत कथा -26


बगडावत कथा -26


बाबा रुपनाथ की बात सुनकर बिजौरी अपने डेरे लादकर आगे बढ़ जाती है और पाटन आकर डेरा डाल देती है। वहां तेजाजी से मिलकर बाकी बगड़ावतों और अपने आधे जेवरके बारे में पूछती हैं। तेजाजी बिजौरी को बताते है कि तू अजमेर चली जा वहां पर सवाई भोज का लड़का मेहन्दूजी है जो तुमको तुम्हारा आधा गहणा दे देगा। अजमेर राजा बिसलदेव का राज्य होता है। उधर मेहन्दूजी अजमेर में बड़े हो जाते है। वहां राजा बिसलदेव के दरबार में बैठते है। मेहन्दूजी बटूर के थानेदार होते हैं जो कि राजा बिसलदेव के राज्य में होता हैं इसलिए व उनकी कचहरी में बैठते थे। जब बिजौरी कांजरी को विश्वास होता है की बगड़ावत भाई तो सभी रण में मारे गये। और सवाई भोज के बड़े बेटे मेहन्दू जी के पास सवाई भोज ने उसका आधा जेवर छोड़कर रखा है और वो अजमेर में है तो वह अपना सामान लादकर अजमेर आती हैवहीं अपना करतब दिखाना शुरु करती है। बहुत ऊंची आसमान में रस्सी बांध कर उस पर चढ़ कर एक बांस हाथ मे लेकर अपने करतब दिखाती है। तमाशा दिखाते हुए वो सवाई भोज के गीत गाती है। बिसलदेव जी अपने छोटे बड़े सभी राजाओं को लेकर आते हैं और बिजौरी से कहते हैं कि बिजौरी मैं तुझे हाथियों का जोड़ा देता हूंदस गांव का पट्टा लिख देता हूं। तू आज से सवाई भोज का नाम लेना छोड़ देऔर मेरा नाम लेने लगजा। बिजौरी कहती है कि आप अपने गांव किसी चारण भाटों को दे दो। मैं तो सवाई भोज का नाम नहीं छोड़ सकती हूं। मैं सारी पृथ्वी की परिक्रमा करके आई हूं लेकिन सवाई भोज जैसा दाता मुझे आज तक नहीं मिला। राजा बिसलदेव जी फिर कहते हैं कि ए बिजौरी तू क्यों मरे हुए के गीत गा रही हैतुझे उससे क्या मिलेगा तू मेरे गीत गामैं तेरे को सोने की मोहरे दूंगा। बिजौरी वापस जवाब देती है कि सवा करोड़ के जेवर मैंने धारण कर रखे हैं। अगर तुम सवा करोड़ के जेवर देकर ढाई करोड़ पूरा कर दो तो मैं तुम्हारे गीत गाने लग जाऊ,जब तक मैं सांस ले रही हूं तब तक तो मैं सवाई भोज को नहीं भूल सकती। ये बात भैरुन्दा का ठाकुर सुन लेता हैं और मेहन्दू जी को बताता है। मेहन्दू जी को याद आता है कि मेरे पिताजी ने मुझे कुछ धन-जेवर दिया थावो पोटली इसी बिजौरी की अमानत है। मेहन्दू जी तिजोरी खोलकर तलाश करते हैं वहां एक ढाल के नीचे रुमाल मे बंधी पोटली मिल जाती है। ढाल पर लिखा होता है बिजौरी कांजरी का शरीर का आधा जेवर जो उसे दे देवें। मेहन्दू जी पोटली लेकर वहां आते हैं जहां बिजौरी अपना करतब दिखा रही है। मेहन्दू जी नीचे से बिजौरीको आवाज लगाते हैं कि में सवाई भोज का लड़का मेहन्दू तेरे शरीर का आधा जेवर तुझे देने आया हूं। मेहन्दू जी को आता देखकर बिजौरी उतावली हो जाती है।मेहन्दू जी आकर बिजौरी को सारा गहणा देते है और कहते है कि यह आपकी अमानत है। बिजौरी मेहन्दू जी से सारा श्रृंगार लेकर पहन लेती है। मेहन्दू बिजौरी को कहते है कि तेरे पीछे मैने बहुत गोते खायेतुझे बहुत ढूंढा। पिताजी कह गये थे कि दिया हुआ दान घर में नही रखना। इसलिये हमने आपको अब यह अमानत दे दी। बिजौरी मेहन्दू जी को आशीष देती है और कहती है कि अपने बाप का बैर जरुर निकालना। बिजौरी कांजरी का जेवर देकर मेहन्दू जी अजमेर से अपने थाने बटूर में वापस आ जाते हैं।