कक्षा-12  विषय- हिन्दी अनिवार्य

पाठ -11 ‘भक्तिन’

लेखिका परिचय- महादेवी वर्मा

जीवन परिचय-

  • ·   महादेवी वर्मा का जन्म फ़रुखाबाद (उ०प्र०) में 1907 ई० में ।
  • ·      प्रारंभिक शिक्षा इंदौर के मिशन स्कूल में हुई थी।
  • ·      नौ वर्ष की आयु में इनका विवाह स्वरूप नारायण वर्मा से हो गया था।
  • ·      1929 ई० में इन्होंने बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहा, परंतु महात्मा गांधी के संपर्क में आने पर ये समाज-सेवा की ओर उन्मुख हो गई।
  • ·      1932 ई० में इन्होंने इलाहाबाद से संस्कृत में एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण कीं और
  • ·      प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना करके उसकी प्रधानाचार्या के रूप में कार्य करने लगीं।
  • ·      मासिक पत्रिका ‘चाँद’ का भी इन्होंने कुछ समय तक संपादन-कार्य किया। इनका कर्मक्षेत्र बहुमुखी रहा है।
  • ·      इन्हें 1952 ई० में उत्तर प्रदेश की विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया।
  • ·      1954 ई० में ये साहित्य अकादमी की संस्थापक सदस्या बनीं।
  • ·      1960 ई० में इन्हें प्रयाग महिला विद्यापीठ का कुलपति बनाया गया।
  • ·      इनके व्यापक शैक्षिक, साहित्यिक और सामाजिक कार्यों के लिए भारत सरकार ने
  • ·      1956 ई० में इन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया।
  • ·      1983 ई० में ‘यामा’ कृति पर इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया।
  • ·      उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने भी इन्हें ‘भारत-भारती’ पुरस्कार से सम्मानित किया।
  • ·      सन 1987 में इनकी मृत्यु हो गई।


रचनाएँ – इनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
काव्य-संग्रह – नीहार, रश्मि, नीरजा, यामा, दीपशिखा।
संस्मरण – अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ पथ के साथी, मेरा परिवार।
निबंध-संग्रह – श्रृंखला की कड़ियाँ आपदा, संकल्पिता, भारतीय संस्कृति के स्वर।

  साहित्यिक विशेषताएँ- ये छायावाद के चार स्तंभों में से एक हैं। इनकी चर्चा निबंधों और संस्मरणात्मक रेखाचित्रों के कारण एक अप्रतिम गद्यकार के रूप में भी होती है। इनकी श्रृंखला की कड़ियाँ कृति एक अद्वतीय रचना है जो हिंदी में स्त्री-विमर्श की भव्य प्रस्तावना है।

भाषा-शैली – इनकी भाषा में बनावटीपन नहीं है। इनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ शब्दों की प्रमुखता है। इनके गद्य-साहित्य में भावनात्मक, संस्मरणात्मक, समीक्षात्मक, इत्तिवृत्तात्मक आदि अनेक शैलियों का रूप दृष्टिगोचर होता है। मर्मस्पर्शिता इनके गद्य की प्रमुख विशेषता है।

 

‘भक्तिन’ पाठ में आये महत्वपूर्ण मुहावरे

  • हौसला पस्त करना  उत्साह नष्ट करना।
  • खरी-खोटी सुनाना - भला-बुरा कहना।
  • कान फुंकवाना - दीक्षा लेना, बहकाना
  • लीक छोड़कर चलना- पम्परा के विपरीत चलना
  • ठोकर मारना – चोट करना।
  • टीला खड़ा होना  बाधाएँ आना।।
  • पहाड़ फोड़ना – बाधाएँ नष्ट करना।
  • जंजीर होना – बंधन होना।

‘भक्तिन’ पाठ का सारांश-

भक्तिन जिसका वास्तविक नाम लक्ष्मी था। लेखिका ‘महादेवी वर्मा’ की सेविका है। बचपन में ही भक्तिन की माँ की मृत्यु हो गयी। सौतेली माँ ने पाँच वर्ष की आयु में विवाह तथा नौ वर्ष की आयु में गौना कर भक्तिन को ससुराल भेज दिया। ससुराल में भक्तिन ने तीन बेटियों को जन्म दिया] जिस कारण उसे सास और जिठानियों की उपेक्षा सहनी पड़ती थी। सास और जिठानियाँ आराम फरमाती थी और भक्तिन तथा उसकी नन्हीं बेटियों को घर और खेतों का सारा काम करना पड़ता था। भक्तिन का पति उसे बहुत चाहता था। अपने पति के स्नेह के बल पर भक्तिन ने ससुराल वालों से समझौता कर अपना अलग घर बसा लिया और सुख से रहने लगी] पर भक्तिन का दुर्भाग्य] अल्पायु में ही उसके पति की मृत्यु हो गई। ससुराल वाले भक्तिन की दूसरी शादी कर उसे घर से निकालकर उसकी संपत्ति हड़पने की साजिश करने लगे। ऐसी परिस्थिति में भक्तिन ने अपने केश मुंडा लिए और संन्यासिन बन गई। भक्तिन स्वाभिमानी] संघर्षशील] कर्मठ और दृढ़ संकल्प वाली स्त्री है जो पितृसत्तात्मक मान्यताओं और छल-कपट से भरे समाज में अपने और अपनी बेटियों के हक की लड़ाई लड़ती है। घर गृहस्थी सँभालने के लिए अपनी बड़ी बेटी दामाद को बुला लिया पर दुर्भाग्य ने यहाँ भी भक्तिन का पीछा नहीं छोड़ा] अचानक उसके दामाद की भी मृत्यु हो गयी। भक्तिन के जेठ-जिठौत ने साजिश रचकर भक्तिन की विधवा बेटी का विवाह जबरदस्ती अपने तीतरबाज साले से कर दिया। पंचायत द्वारा कराया गया यह संबंध दुखदायी रहा। दोनों माँ-बेटी का मन घर-गृहस्थी से उचट गया] निर्धनता आ गयी ] लगान न चुका पाने के कारण जमींदार ने भक्तिन को दिन भर धूप में खड़ा रखा। अपमानित भक्तिन पैसा कमाने के लिए गाँव छोड़कर शहर आ जाती है और महादेवी की सेविका बन जाती है। भक्तिन के मन में महादेवी के प्रति बहुत आदर] समर्पण और अभिभावक के समान अधिकार भाव है। वह छाया के समान महादेवी के साथ रहती है। वह रात-रात भर जागकर चित्रकारी या लेखन जैसे कार्य में व्यस्त अपनी मालकिन की सेवा का अवसर ढूँढ लेती है। महादेवी] भक्तिन को नहीं बदल पायी पर भक्तिन ने महादेवी को बदल दिया।भक्तिन के हाथ का मोटा-देहाती खाना खाते-खाते महादेवी का स्वाद बदल गया] भक्तिन ने महादेवी को देहात के किस्से-कहानियाँ] किंवदंतियाँ कंठस्थ करा दी। स्वभाव से महाकंजूस होने पर भी भक्तिन] पाई-पाई कर जोड़ी हुई राशि को सहर्ष महादेवी को समर्पित करने को तैयार हो जाती है। जेल के नाम से थर-थर काँपने वाली भक्तिन अपनी मालकिन के साथ जेल जाने के लिए बड़े लाट साहब तक से लड़ने को भी तैयार हो जाती है। भक्तिन] महादेवी के जीवन पर छा जाने वाली एक ऐसी सेविका है जिसे लेखिका नहीं खोना चाहती।