जब रामचंद्रजी चित्रकूट पहुंचे, तो उनका मन वहाँ रम गया। यह देखकर देवता अपने मुख्य भवननिर्माता विश्वकर्माजी को लेकर वहाँ पहुँच गए। सभी देवताओं ने कोल-भीलों के वेष में आकर दिव्य पत्तों तथा घास के सुंदर घर बना दिए। उन्होंने दो सुंदर कुटियाँ बनाईं, जिनमें एक बड़ी और दूसरी छोटी थी।
हमें प्रायः यह पता नहीं होता कि कितने सारे लोग किस तरह से हमारी मदद कर रहे हैं। इसलिए मनुष्य को हर दिन कृतज्ञता का अभ्यास करना चाहिए। देवता जब हमारी मदद करते हैं, तो हमें यह पता नहीं होता कि वे किस वेष में या किस मनुष्य के माध्यम से हमारी मदद कर रहे हैं।
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