विश्वामित्रजी रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी को सीताजी के स्वयंवर में ले गए। राजा जनक ने यह घोषणा की थी कि जो भी वीर शिवजी का धनुष तोड़ेगा, उसी के साथ सीताजी का ब्याह होगा। विवाह से पूर्व जब सीताजी गौरीपूजन के लिए जा रही थीं, तो राम ने उन्हें देखा और उनके मंगलदायक दाहिने अंग फड़कने लगे। उन्होंने सोचा कि मैंने तो स्वप्न में भी कभी परायी स्त्री पर दृष्टि नहीं डाली है, फिर सीताजी को देखते ही आकर्षण क्यों हो रहा है। उधर सीताजी भी रामचंद्रजी को देखने के बाद विकल होकर प्रेम के वश में हो गईं। उन्होंने मन ही मन रामचंद्रजी का वरण कर लिया, लेकिन इस चिंता में पड़ गईं कि इतने सुकुमार रघुनाथजी इतने भारी धनुष को कैसे तोड़ पाएँगे।
फिर सीताजी ने पार्वतीजी की मूर्ति के सामने प्रार्थना की कि वे उनका मनोरथ पूरा करें। पार्वतीजी के गले की माला थोड़ी खिसक गई और सीताजी ने उसे प्रसाद की तरह धारण किया। पार्वतीजी ने सीताजी को आश्वस्त किया कि तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी और तुम्हें तुम्हारा मनचाहा वर मिलेगा।
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