रामचंद्रजी और सीताजी के विवाह के बाद भरतजी का विवाह माण्डवी से हुआ, लक्ष्मणजी का विवाह उर्मिला के साथ हुआ और शत्रुघ्नजी का विवाह श्रुतकीर्ति से हुआ। जब चारों पुत्र विवाह के पश्चात अयोध्या लौटे, तो माताओं ने रामचंद्रजी से कहा कि यह सब विश्वामित्रजी की कृपा से हुआ है, जिस कारण उन्होंने राक्षसों को मारा और शिवजी का धनुष तोड़ा।
उन्होंने यह भी कहा कि 'जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।' अर्थात् तुमको बिना देखे जो दिन बीते हैं, उन्हें ब्रह्मा हमारी आयु में जोड़े।
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