जब राम-लक्ष्मण विश्वामित्रजी के साथ जा रहे थे, तो उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया, जहाँ कोई नहीं था, सिर्फ पत्थर की एक शिला थी। जब रामचंद्रजी ने विश्वामित्रजी से पूछा कि यह क्या है, तब मुनि ने इसके पीछे की कहानी बताई। उन्होंने बताया कि गौतम मुनि की पत्नी अहल्या पर इंद्र मोहित हो गए थे। अहल्या भी इंद्र के प्रति आकर्षित हो गई थी, जिस कारण गौतम मुनि ने अहल्या को जड़ बनकर पत्थर होने का शाप दे दिया। बाद में दया करके उन्होंने यह भी कहा कि प्रभु के चरण पड़ने पर अहल्या फिर से जीवित हो जाएंगी। विश्वामित्रजी के कहने पर रामचंद्रजी ने जैसे ही उस शिला पर पैर लगाया, अहल्या सचमुच जीवित हो गईं और उनका उद्धार हुआ।
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