नाम का प्रताप तुलसीदासजी ने पुस्तक के प्रारंभ में आदिकवि श्री वाल्मीकिजी का स्मरण किया है, जिन्होंने संस्कृत में रामायण लिखी थी। उन्होंने लिखा है कि वाल्मीकिजी राम नाम के प्रताप को जानते हैं, क्योंकि वे उलटा नाम 'मरा, मरा,' जपकर पवित्र हो गए। राम का नाम अपने आप में विपुल संपदा है और सहस्त्र नामों के समान हैं। वाल्मीकिजी का मूल नाम रत्नाकर था। वे डाकू थे, जो संतों और राजाओं से धन चुराते थे। एक बार उन्होंने नारद मुनि को लूटने की कोशिश की, तो उन्होंने पूछा कि तुम लोगों को क्यों लूटते हो। रत्नाकर ने जवाब दिया कि वह यह काम परिवार का पेट पालने के लिए करता है। तब नारद मुनि ने पूछा कि जिस परिवार की ख़ातिर तुम यह पाप कर रहे हो, क्या वे लोग तुम्हारे पाप के परिणामों में भागीदार बनेंगे। रत्नाकर डाकू ने जब परिवार वालों से पूछा, तो सभी ने इंकार कर दिया कि वे पाप के भागीदार नहीं बनेंगे। इस पर रत्नाकर डाकू का मोहभंग हो गया और उनका हृदय परिवर्तन हो गया।
तब नारद मुनि ने रत्नाकर को राम नाम का मंत्र दिया और कहा कि इसके जाप से वे संसार के सबसे अमीर आदमी बन जाएंगे। रत्नाकर के मुँह से राम नाम निकल नहीं रहा था, इसलिए नारदजी ने कहा कि वे 'मरा, मरा' शब्द का उच्चारण करें, अर्थात मैं कष्टों से मरा। नारदजी ने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि डाकू 'मरा' शब्द का उच्चारण आसानी से कर सकता था। बार-बार जपने से वह राम, राम की ध्वनि में बदल गया और उनका उद्धार हुआ। इस मंत्र को बोलते-बोलते रत्नाकर राम में ऐसे रमे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब वे तपस्या में लीन हो गए और उनके शरीर पर दीमकों ने बाँबी बना ली। रत्नाकर की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें दर्शन दिए और इनके शरीर की बाँबी को देखकर वाल्मीकि नाम दिया। ब्रह्माजी ने ही उन्हें रामायण का सृजन करने की प्रेरणा दी।
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