तारक नाम के असुर ने जब देवताओं को हरा दिया, तो वे ब्रह्माजी के पास जाकर गिड़गिड़ाने लगे। तब ब्रह्माजी ने उपाय बताया कि यह दैत्य शिवजी के वीर्य से उत्पन्न पुत्र से ही मरेगा।
यह पता चलने के बाद देवताओं ने विचार किया कि शिवजी से पुत्र कैसे उत्पन्न कराएँ। सती ने देहत्याग कर दिया था और हिमाचल के घर पैदा हो गई थी, इसलिए सबसे आसान उपाय यह था कि उनकी शादी शिवजी से करा दी जाए। समस्या यह थी कि शिवजी समाधि लगाकर बैठे हुए थे। उनकी समाधि को तोड़ना काफ़ी मुश्किल काम था और इसके लिए देवताओं ने कामदेव से अनुरोध किया कि वह शिवजी की समाधि भंग करदे। कामदेव ने फूलों के पाँच पैने बाण मारकर शिवजी की समाधि तो तोड़ दी, लेकिन शिवजी को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को तुरंत भस्म कर दिया। जब कामदेव की पत्नी रति शिवजी के पास पहुँचकर रोई, तो शिवजी को दया गई। उन्होंने रति से कहा कि कामदेव का नाम अब से अनंग होगा और वह बिना शरीर के ही सबको व्यापेगा। उन्होंने आगे यह भी कहा कि जब यदुवंश में श्रीकृष्ण का अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र प्रद्युम्न के रूप में पैदा होगा। कामदेव के भस्म होने के बाद देवाताओं ने शिवजी से शादी करने का आग्रह किया। शिव-पार्वती विवाह के बाद छह मुख वाले स्वामिकार्तिक का जन्म हुआ, जिन्होंने युद्ध में तारकासुर को मार डाला।
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