ONLINE GURUJI: January 2020

Gurjar History

Friday, January 31, 2020

कामदेव हुए भस्म



तारक नाम के असुर ने जब देवताओं को हरा दिया, तो वे ब्रह्माजी के पास जाकर गिड़गिड़ाने लगे। तब ब्रह्माजी ने उपाय बताया कि यह दैत्य शिवजी के वीर्य से उत्पन्न पुत्र से ही मरेगा।
यह पता चलने के बाद देवताओं ने विचार किया कि शिवजी से पुत्र कैसे उत्पन्न कराएँ। सती ने देहत्याग कर दिया था और हिमाचल के घर पैदा हो गई थी, इसलिए सबसे आसान उपाय यह था कि उनकी शादी शिवजी से करा दी जाए। समस्या यह थी कि शिवजी समाधि लगाकर बैठे हुए थे। उनकी समाधि को तोड़ना काफ़ी मुश्किल काम था और इसके लिए देवताओं ने कामदेव से अनुरोध किया कि वह शिवजी की समाधि भंग करदे। कामदेव ने फूलों के पाँच पैने बाण मारकर शिवजी की समाधि तो तोड़ दी, लेकिन शिवजी को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को तुरंत भस्म कर दिया। जब कामदेव की पत्नी रति शिवजी के पास पहुँचकर रोई, तो शिवजी को दया गई। उन्होंने रति से कहा कि कामदेव का नाम अब से अनंग होगा और वह बिना शरीर के ही सबको व्यापेगा। उन्होंने आगे यह भी कहा कि जब यदुवंश में श्रीकृष्ण का अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र प्रद्युम्न के रूप में पैदा होगा। कामदेव के भस्म होने के बाद देवाताओं ने शिवजी से शादी करने का आग्रह किया। शिव-पार्वती विवाह के बाद छह मुख वाले स्वामिकार्तिक का जन्म हुआ, जिन्होंने युद्ध में तारकासुर को मार डाला।
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शिव-पार्वती विवाह की भूमिका

यज्ञ में प्राणोत्सर्ग के समय सती ने भगवान हरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्मांतर तक शिवजी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण शरीर भस्म होने के बाद उनका जन्म हिमाचल के घर पर उमा यानी पार्वती के रूप में हुआ। एक बार नारदजी घूमते हुए हिमाचल के घर पहुंचे। हिमाचल ने नारदजी से कहा कि आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, अतः आप इस कन्या का भविष्य बताएँ। नारदजी बोले कि कन्या की रेखाओं से यह स्पष्ट है कि इसे गुणहीन, मानहीन, उदासीन, लापरवाह, योगी, जटाधारी, नंगा और अमंगल वेष वाला मिलेगा। यह सुनकर पार्वती के माता-पिता हिमाचल और मैना दोनों को भारी दुख हुआ, जबकि पार्वतीजी बहुत खुश हुई, क्योंकि वे जानती थीं कि ये सारे अवगुण तो शिवजी की ओर संकेत करते हैं|
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शिवजी का अपमान



जब सती ने देवताओं को विमान में बैठकर आसमान में जाते देखा, तो उन्होंने शिवजी से पूछा कि ये सारे देवता कहाँ जा रहे हैं। शिवजी ने बताया कि दक्ष प्रजापति यज्ञ करा रहे हैं और ये देवता वहीं जा रहे हैं। वे शिवजी से बोलीं कि मेरे पिता के घर इतना बड़ा उत्सव है, तो क्या मैं उसे देखने जाऊँ? शिवजी ने कहा कि उन्होंने न्योता नहीं भेजा है। हे सती, दक्ष ने अपनी सब लड़कियों को बुलाया है, केवल तुम्हें ही नहीं बुलाया। शिवजी ने सती से कहा कि बिना बुलाए जाओगी, तो शील-स्नेह और मान-मर्यादा नहीं रहेगी। लेकिन सती मायके के मोह और विधि के विधान से विवश थीं, इसलिए उन्होंने शिवजी की बात नहीं मानी और यज्ञ में चली गईं। उनके पिता दक्ष ने उन्हें देखकर मुँह फेर लिया और हालचाल भी नहीं पूछे। सती को यज्ञ में शिवजी का भाग कहीं दिखाई नहीं दिया। पति का अपमान देखकर सती क्रोधित हो गईं और उन्होंने योगाग्नि में अपना शरीर भस्म कर डाला। सती के मरण के बाद शिवजी के गणों ने यज्ञ का विध्वंस कर दिया।
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