बगडावत कथा -29




तलावत खां ने राणाजी को कैद कर अपने साथ ले जाते समय रास्ते में शोभादे कोजो पुरोहित की लड़की होती हैउसको भी पकड़ लिया। खरनार के बादशाह को रावजी ने कहा तू शोभादे को छोड़ दे। बादशाह ने कहा कि मैं शोभादे को एक शर्त पर छोड़ दूंगातुम मेरा निकाह तारादे से करा दो। बादशाह एक लोहे का पिंजरा बना कर रावजी को बन्द कर लेता है और शोभादे से निकाह कर लेता है। और उन दोनों को साथ लेकर खरनार वापस चला जाता है। जब तारादे को पता चलता है कि तलावत खांबाबासा (रावजीको कैद कर ले गया है तब तारादे सांडीवान के हाथ भीलों की खाल में अपने भाई भूणाजी को संदेश भेजती हैं कि भूणाजी मैं बहुत बीमार हूं और अगर आखिरी समय मुझसे मिलना हो तो जल्दी से आ जाओ। तारादे दूसरा परवाना दीयाजी और कालूमीर को लिखती है कि बाबा रावजी को खरनार का बादशाह पकड़ ले गया है। उधर भूणाजी धाधूं भील को मारकर वहां से अपनी बोर घोड़ी को छुड़ाकरसाथ लेकर राण वापस आते है। तारादे भूणाजी को सारी बात सुनाती है कि तलावत खां सात संमुदर पार रावजी को कैद कर ले गया है। विनती करती है कि उन्हें छुड़ाकर लायें। भूणाजी तारादे को कहते हैं कि अगर तू मुझे भीलमाल में ही पूरा समाचार लिख भेजती तो मैं बादशाह को रास्ते में ही रोक लेता,लेकिन तूने तो अपनी बीमारी का समाचार भेजा था। और फिर रावजी के सारे उमराव तो यहीं वापस आ गए थे। उन्होनें तलावत खां को क्यों नहीं रोका तारादे तब भूणाजी को बताती है कि वे सब तो महल में छिप कर बैठ गए थे। इस पर भूणाजी कहते हैं कि तारादे अब तक तो तलावत खां ने उन्हें मार दिया होगा। अब जाने से क्या फायदा। और सात संमुदर पार इतनी सारी सेना हाथी घोड़ो को लेकर जाना भी मुमकिन नहीं है। राणी सांखली भूणाजी को ताना कसती है कि भूणाजी आप मेरे जाये नहीं हो इसलिये आप नहीं जाना चाहते हैं। आप को राण का राज ज्यादा प्यारा है। राणी सांखली का उलाहना सुनकर भूणाजी जाने के लिये तैयार हो जाते हैं और बहादुर सैनिको का चुनाव करउमरावोंसरदारों और राजाओं को इकट्ठा करते हैं। दीयाजीकालूमीरटोडा के सोलंकी और पिलोदा ठाकुर को संदेश भेजते हैं कि रावजी को खरनार के बादशाह की कैद से आजाद कराने के लिए हम सबको साथ-साथ काबुल चलना होगा। भूणाजी तलावत खां खिलजी से युद्ध करने के लिये राणी सांखली से विदाई लेते हैं।वह भूणाजी की आरती करती है और तिलक लगा कर विदा करती हैं। भूणाजी की फौज खरनार के बाहर समुद्र के किनारे पहुंच जाती है। भूणाजी अपनी बोर घोड़ी को कहते हैं कि हम दोनों को यह समुद्र लांघकर अकेले ही खरनार पहुंचना होगा। इतने सारे सैनिक समुद्र लांघ कर कैसे जाऐंगे घोड़ी कहती है कि भूणाजी गढ़ कोटे होते तो मैं जरुर चढ़ जाती मगर पानी तो मैं नहीं लांघ सकती। तब भूणाजी बन्ना चारण से कहते हैं कि मैंने माताजी को वचन दिया है तो बाबाजी को छुड़ाने तो जाना ही पड़ेगा। लेकिन इस समुद्र को कैसे पार किया जाए। बन्ना चारण कहता है भूणाजी भगवान देवनारायण का ध्यान कीजिए। वे ही इस समस्या को हल करेंगे। भूणाजी स्नान-ध्यान कर देवनारायण को याद करते हैं। देवनारायण भूणाजी की सहायता के लिए भैरुजी को भेजते हैं। भैरुजी आते हैं और पानी में पत्थर का रास्ता बना देते हैं। भूणा जी की फौज पानी के ऊपर के रास्ते पर चल पड़ती है। सात समुद्र को पार कर भूणा जी अपनी फौज के साथ खरनार पहुंच जाते हैं। भूणाजी खरनार के बादशाह पर हमला कर महल में जाकर उनको पकड़ लेते हैं। भूणाजी खरनार के बादशाह को मारने ही वाले होते हैं कि बीच में शोभादे आ जाती हैं और भूणाजी से कहती है कि दादा ये जैसे भी हैं अब मेरे पति हैंआप इनको छोड़ दीजिए। भूणाजी तारादे की तरह शोभादे को भी अपनी बहन मानते थे इसलिए खरनार के बादशाह को माफ कर जीवित छोड़ देते हैं। और रावजी को कैद से छुड़ाकर वापस राण की तरफ रवाना होते हैं। जब भूणाजी रावजी को साथ लेकर राण पहुंचते हैं तो रानीजी भूणाजी और रावजी की आरती करती हैं। राण में वापस खुशियां लौट आती हैं।राता कोट में घी के दिये जल उठते है इधर अजमेर में जब राजा बिसलदेव जी को पता चलता है कि देवनारायण ने मालवा से वापस आकर खेड़ा चौसला नामक गांव बसा लिया है तब वह बहुत ही नाराज होते हैं और सांड़ीवान के हाथ देवनारायण के नाम संदेश भेजते हैं कि मेरी आंखों के सामने पले बड़े बालक-टाबर ने गांव बसा लिया और हमको खबर भी नहीं करी। अब आकर इसकी करनी भरो और साथ ही यह भी लिखते हैं कि मेहन्दू जी को हमने छोटे से बड़ा किया था और इसको बटूर के थानेदार बनाया थाइसके पीछे जो खर्चा हुआ था वो भी हमें लौटाओ। देवनारायण बिसलदेव जी का संदेश पढ़कर छोछू भाट को लेकर अजमेर की ओर रवाना होते हैं। जैसे ही देवनारायण के घोड़े नीलागर के पांव की टांपे अजमेर शहर में पड़ती हैं वैसे ही बिसलदेव जी का राज धूजने (हिलनेलग जाता है। देवनारायण बाहर ही रुक जाते हैं और छोछू भाट अजमेर की कचहरी में जाकर बिसलदेव को बताता है कि देवनारायण पधारे हैं। देवनारायण फिर अजमेर के महल का कांगड़ा तोड़ते हैं। बिसलदेवजी देखते हैं कि देवनारायण तो बहुत बलवान हैंकहीं ये महलों में आ गये तो महल टूट जायेगा। वो अपने दानव भैंसा सुर को बुलाते हैं और कहते हैं कि भैसा सुर एक ग्यारह वर्ष का टाबर नीलागर घोड़े पर सवार अजमेर में आया हैजाकर उसे खा जाओं।