Gurjar History : November 2019

Gurjar History

Friday, November 29, 2019

देवनारायण योजना

देवनारायण योजना
देवनारायण योजना

लाभार्थी
1. बंजारा, बालदिया, लबाना 
2. गाड़िया लोहार, गदोलियाँ , 
3. गुजर, गुर्जर 
4. राईका, रैबारी, देवासी, देबासी 
    
देवनारायण योजनान्तर्गत विशेष पिछड़े वर्ग के कल्याण हेतु राज्य सरकार द्वारा संचालित योजना 
विशेष पिछड़े वर्ग छात्रवृत्ति योजना (उत्तर मैट्रिक व अनुप्रति )
प्रतिभावान छात्र प्रोतसाहन योजना 
छात्रा उच्च शिक्षा योजना 
छात्रा साईकिल वितरण योजना 
छात्रा स्कूटी वितरण व नगद राशि वितरण 
गुरुकुल योजना 
पूर्व मैट्रिक योजना


अधिकारिक वेबसाइट :
http://www.sje.rajasthan.gov.in

सम्पूर्ण योजना का विवरण के  लिए दिए गये लिंक पर क्लिक करके  PDF DOUNLOD करे 
http://www.sje.rajasthan.gov.in/Schemes/DevnarayanScheme.pdf

“जय जय जननायक - जय जय राजस्थान”

Thursday, November 28, 2019

गुर्जरात्रा, गुर्जरदेश -


गुर्जरात्रा, गुर्जरदेश -


गुर्जरात्रा, गुर्जरदेश







गुजरात शब्द सस्कृत के शब्द गुजरात्रा अथवा प्राकृत के गुजराता से निकला हे जिसका अर्थ है गुर्जरो का दैश अथवा गुर्जरो दवारा रक्षित क्षेत्र ।
गुजरात  ( काठियावाड - भारत ) गुजरात,  गुजरावाला गुजरखान ( पाकिस्तान ), गुजरस्थान (गजनी  के पास अफगानिस्थान),  गुजरस्तान (जॉर्जिया )गुर्जर घार (ग्वालियर )गुर्जरी बाजार ( पटना - बिहार,  मेरठ - उ.प्र.) गुर्जर ताल  ( बाडमेर - राजस्थानजौनपुर - उ.प्र  )गुर्जर नदी  ( बलूचिस्तान -पाकिस्तान ) पोषवाल मन्डी    ( जददा-सउदी अरब ) गुर्जर खासी  ( अफगानिस्थान ) खटाना खील व कसाना खील कबाइलि प्रान्त  ( अफगानिस्थान ) भाजन गुर्जरी (जलगांव -महाराष्ट्र ) गुर्जर पाल  (भोपाल -मध्यप्रदेश ) गुर्जर नगर  (जम्मू ) गुर्जर घाटी ( जयपुर- राजस्थान ) आदि गुर्जरो के प्रतीक चिन्ह हे।

 पचंतन्त्र मे कथा आती हे जिसके अनुसार गुर्जर दैश जहा ऊटो का मेला लगता था । यह वर्णन मिलता हे कि एक रथकार इस गुर्जर देश मे ऊंट लेने के लिए गया ।
 गुजरात से लेकर काश्मीर तक का पूरा इलाका "गुर्जर दैश" के नाम से जाना जाता था ।


संदर्भ

1.  पंचतंत्र कथा -14
2. कीलहार्न सस्करण पृष्ठ - 32 ( सर जान मार्शल )
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Wednesday, November 27, 2019

गुर्जर तथा गुर्जरात्रा

गुर्जर तथा गुर्जरात्रा





पुराने वंशो से नए नाम के साथ नई नई जातियाँ और कबीले बन जाते हैं। इक्ष्वाकु पुरू व यदु कुल के उच्च श्रेणी के क्षत्रिय रक्त व साहसिक कार्यों के आधार पर संगठित हो गए तथा गुर्जर नाम से प्रसिद्ध हुए। उस समय गुर्जरो के आधीन का जो क्षेत्र था उसे गुर्जर देश या गुर्जरात्रा कहा जाता था।
·        गुर्जर शब्द के दो घटक भाग है  गुर + उज्जर
संस्कृत में यदि किसी अक्षर पर बिन्दु लगा दिया जाए तो वह अक्षर नाक में बोला जाता हैं। जैसे - माँ हाँ आदि।
·        गुरं का अर्थ है शत्रु   उज्जर का अर्थ नष्ट करने वाला।
इसमें बिन्दु का धीरे धीरे लोप हो गया तथा गुर+उज्जर मिलकर काल क्रम से गुर्जर बन गया जिसका अर्थ है शत्रु को नष्ट करने वाला।   यह पुल्लिंग है
अधिक  जानकारी  के  लिए संस्कृत शब्द कोष शब्द कलद्रुपम - द्वारा पंराधा कान्त शर्मा - भाग -2पृष्ठ 341 शकाब्द - 1181 )
इस उपमहाद्वीप की क्षेत्रीय भाषाएँ फारसी या पहलवी संस्कृत की ही शाखाएँ हैं। बहुत संस्कृत शब्द  इन भाषाओं में विरूपित हो गए तथा स्वर बदल गए हैं।फारसी में गुरं शब्द गिरान बन गया जिसका अर्थ भारीकठिनमहंगा तथा मूल्यवान है। जैसे जिन्दावस्ता में संस्कृत के पुत्र का पिथर होता हैं।
·        गुर+उज्जर का अर्थ है जो अत्यंत दुखदायी शक्तिशाली शत्रु को नष्ट कर देता है
   ( अधिक  जानकारी  के  लिए फारसी -अंग्रेजी शब्दकोश - द्वारा एफ• स्टीगस पीएचडी• संस्करण -1930 कालम -2 )
संस्कृत में त्र का अर्थ है रक्षित  अत: गुर्जरात्रा का अर्थ है गुर्जरो द्वारा रक्षित अथवा गुर्जरो की सुरक्षा में।



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Tuesday, November 26, 2019

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य और गुर्जर सम्राट उसके अधीन आने वाले प्रमुख वंश


गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य और गुर्जर सम्राट उसके अधीन आने वाले प्रमुख वंश












गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य और गुर्जर सम्राट उसके अधीन आने वाले प्रमुख वंश
गुर्जर प्रतिहार राजवंश (650-1036 ई०)
1.    नागभट्ट गुर्जर सम्राट
   2 ककुष्ठा और देवराज गुर्जर
3. वत्सराज गुर्जर सम्राट
नागभट्ट द्वित्तीय
5 रामभद गुर्जर सम्राट
मिहिर भोज महान
7. महेंदर पाल सम्राट
8. महिपाल गुर्जर सम्राट
9 महेंदर पाल द्वितीय
10. देवपाल गुर्जर सम्राट
11. विजयपाल गुर्जर सम्राट
12. राज्यपाल गुर्जर सम्राट
13. त्रलोचनपाल गुर्जर सम्राट
14. यशपाल गुर्जर सम्राट



गुर्जर प्रतिहार राजवंश के अधीन आने वाले प्रमुख वंश
1. परमार गुर्जर वंश
2. चौहान गुर्जर वंश
3. गुहिल गुर्जर वंश
4. मोरी गुर्जर वंश
5. चंदेल गुर्जर वंश
7. गुर्जरेश चालुक्य वंश
8. तोमर तंवर गुर्जर वंश
9.खटाणा गुर्जर
10. भाटी गुर्जर वंश
11. मैत्रक गुर्जर वंश
12. चप गुर्जर वंश (चावडा)
13. भडाणा गुर्जर वंश
14. धामा गुर्जर यश

गुर्जर रणनृत्य कला

भारत की एक प्राचीन युध्दकला गुर्जर सम्राट नागभट्ट ने उज्जैन को नयी राजधानी बनाया। नागभट्ट ने भारतीय संस्कृति व सभ्यता के लिये जो किया वह -अतुलनीय है। इसीलिये इन्हें राष्ट्रनायक की उपाधि से विभूषित किया जाता है। राष्ट्ररक्षक वीर गुर्जर यह कथन उन्हीं के कारण चरितार्थ हुआ।गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य ने 300 साल विदेशीयो से देश की रक्षा की। इसी समय गुर्जरी ने एक नये युद्धनृत्य की रचना की जिसे गुर्जर रणनृत्य कहा जाता है। गुर्जरो के संख्या बल में कम होने के कारण व शत्रुओ की विशाल सेना से भिड़ने से पूर्व यह नृत्य किया जाता था जिससे शत्रु को भ्रम होता था कि गुर्जर सैना बहुत अधिक है। गुर्जर रणनृत्य कला पर आज भी रिसर्च जारी है।
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Monday, November 25, 2019

बगड़ावत देवनारायण फड़ भाग 5



भगवान विष्णु बगड़ावतों को श्राप देने के लिये देव लोक से पृथ्वी पर साधु का वेश धारण कर बगड़वतों के गांव गोठां में प्रकट होते हैं। साडू माता अपने महल में पूर्ण नग्न अवस्था में स्नान कर रही होती है और सभी बगड़ावत गायें चराने हेतु जंगल में गये होते हैं। साधु वेश धारण कर भगवान विष्णु साडू माता के द्वार पर आकर भिक्षा मांगते हैं। साडू माता की दासी भिक्षा लेकर आती है तो साधु भिक्षा लेने से मना कर देते है और कहते हैं कि वह दास भिक्षा ग्रहण नहीं करेगें तुम्हारी मालकिन अभी जिस अवस्था में है उसी अवस्था में आकर भिक्षा दे तो वो ग्रहण करेगें अन्यथा वह श्राप दे कर चले जाऐगे।  
यह बात सुनकर साडू माता सोचती है कि यह साधु जरुर कोई पहुंचे हुए संत हैं, इन्हें अगर इसी अवस्था में भिक्षा नहीं दी तो वो जरुर श्राप दे देंगे। साडू माता नहाना छोड़ नग्न अवस्था में ही दान लेकर साधु महाराज को देने के लिये आती है। भगवान देखते है कि यह तो उसी अवस्था में चली आ रही है। साडू माता एक दैवीय शक्ति होती है। उसके सतीत्व के प्रभाव से उसके सिर के केश (बाल) इतने बढ़ जाते हैं कि उसके केशों से सारा शरीर ढक जाता है। साधु को दान देकर उन्हे प्रणाम करती है।  साधु वेश धारण किये भगवान कहते है कि मैं तुमसे प्रसन्न हुआ। तू कोई भी एक वरदान मांग। मैं आया तो तुझे छलने के लिये था (श्राप देने) मगर तेरे विश्वास से मैं प्रसन्न हुआ। साडू माता भगवान से कहती है कि महाराज मेरे कोई सन्तान नहीं है और अपने केशों की झोली फैलाकर कहती है की मेरी खाली झोली भर दो। भगवान कहते हैं तथास्तु। साडू माता तू अगर अपनी कोख बताती तो मैं तेरे गर्भ से जन्म लेता। लेकिन तूने झोली फैलाई है इसलिये मैं तेरी झोलियां ही आ साडू माता पूछती है भगवान कैसे?  

साधू महाराज अपने असली रुप में आकर साडू माता को दर्शन देते हैं और कहते हैं कि जब भी तुम पर कोई विपदा आये तो तुम सुवा और सोतक के दिन टाल कर सुबह ब्रह्म मुहर्त में नहा-धोकर सच्चे मन से मेरा ध्यान करना, मैं स्वयं तेरी झोली में जन्म लूंगा। सबसे पहले पानी बहकर आयेगा और उसमें कमल के फूल खिलेंगे। उन्हीं में से एक कमल के फूल में से मैं अवतरीत हो यह कह कर भगवान अन्तध्र्यान हो जाते हैं। भगवान विष्णु वापस आकर राजा बासक से कहते हैं मैं गया तो साडू माता को छलने के लिये था मगर उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दे बैठा। अब मैं कुछ नहीं कर सकता। चलो मैं तुमको शक्ति के पास ले जाता हूं, वह ही कुछ कर सकती हैं। भगवान विष्णु और राजा बासक दुर्गा के पास आते है और अपनी सारी बात ताते है। दुर्गा उन दोनों की बात सुनकर कहती है कि बगड़ावत तो मेरे सेवक हैं, मेरी भक्ति से पूजा करते रहते हैं। मैं उन्हें कैसे छल सकती हूं? मगर आपके लिये कुछ तो करना ही होगा। और बगड़ावतों को खपाने (मारने) का वचन राजा बासक को दे देती है। और दुर्गा, बुआल के राजा के यहां अवतरी होने की योजना बनाती है। आल के राजा शिकार खेलने जंगल में जाते हैं और उन्हें वहाँ एक पालने में शिशु कन्या मिलती है। वह उसे घर ले आते है और उसका नाम जयमती रखते हैं। जयमती के रुप मे दुर्गा देवी के साथ एक और देवी, दासी के घर जन्म लेती है। उसका नाम हीरा होता है बुआल के राजा के कोई सन्तान नहीं होती है इसलिए वह बहुत खुश होते है और उनका बहुत खुशी से पालन पोषण करते हैं। हीरा और जयमती साथ-साथ बड़ी होती है और सखियों की तरह रहती हैं। हीरा राजकुमारी जयमती की सेवा में ही रहती है।

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बगड़ावत देवनारायण फड़ भाग 4


4 बगड़ावत और रावजी नौलखा बाग में


नियाजी से मिलकर नीमदेवजी वापिस रावजी के पास जाकर कहते हैं कि वे तो बाघ जी के बेटे बगड़ावत हैं। रावजी कहते हैं कि फिर तो वे अपने ही भाई है ।  रावजी सवाई भोज के पास आकर उनको अपना धर्म भाई बना लेते हैं। और उन्हें बड़े आदर के साथ नौलखा बाग में ठहराते हैं और खूब दारू पिलाते हैं।
 यह बात सुनकर पातु शर्त के लिये तैयार हो जाती है और सवाई भोज के पास जाती है और अपनी सारी दारु सवाई भोज की हथेली में उंडेलती है। यहां तक की पातु की सारी दारु खतम हो जाती है। उसकी दोनों दारु की झीलें सावन और भादवा खाली हो जाती हो जाती है।    मगर सवाई  भोज की हथेली खाली रह जाती है, भर नहीं पाती है। यह देखकर पातु घबरा जाती है और सवाई भोज के पांव पकड़ लेती है और कहती है कि आप मुझे अपनी राखी डोरा की बहन बना लीजिये। और सवाई भोज को राखी बान्ध कर अपना भाई बना लेती है।  बगड़ावत नौलखा बाग से वापस आते समय मेघला पर्वत पर पातु द्वारा दिया गया दारु का बीड़ा खोलते हैं। उसमें से इतनी दारु बहती है कि धोबी उसमें अपने कपड़े धोने लगते है। बगड़ावत वहां काफी मात्रा में शराब गिराते है और उससे कुल्ले करते हैं। वह शराब इतनी मात्रा में जमीन पर उण्डेलते है कि शराब रिस कर पाताल लोक में जाने लगती है जो पृथ्वी को अपने शीश पर धारण करने वाले राजा बासक के सिर पर जाकर टपकती हैं, उससे शेषनाग कुपित हो जाते है। गुस्सा होते हुए राजा बासक तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु के पास जाकर बगड़ावतों की शिकायत करते हैं और कहते हैं कि हे नारायण बगड़ावतों को सजा देनी होगी। उन्होने मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया है। आप कुछ करिये भगवान।

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Sunday, November 24, 2019

बगड़ावत देवनारायण फड़ भाग 3







एक बार सवाई भोज अपने भाइयों के साथ अपने राजा (रावजी) से मिलने जाने की योजना बनाते हैं। अपने सभी घोड़ो कोसोने के जेवर पहनाते हैं। साडू माता नियाजी से पूछती है कि इतनी रात को कहाँ जाने की तैयारी है। नियाजी उन्हें अपनी योजना के बारे में बताते हैं और फिर सारे भाई राण की तरफ निकल पड़ते हैं। रास्ते में उन्हें पनिहारिने मिलती हैं और बगड़ावतों के रुप रंग को देखकर आपस में चर्चा करने लगती हैं। आगे जाकर उन्हें राण के पास एक खूबसूरत बाग दिखाई देता है, जिसका नाम नौलखा बाग होता है। वहां रुक कर सभी भाईयों की विश्राम करने की इच्छा होती है। यह नौलखा बाग रावजी दुर्जनसाल की जागीर होती है।    नौलखा बाग में बगड़ावत.......
नियाजी माली को कहते हैं कि पैसे लेकर हमें बैठने दे, लेकिन माली बगड़ावतों को वहां विश्राम करने से मना कर देता है। जिससे बगड़ावत गुस्सा हो जाते हैं वे उसे खूब पीटते हैं और नौलखा बाग का फाटक तोड़कर उसमें घुस जाते हैं।  
बाग का माली मार खाकर रावजी से उनकी शिकायत करने जाता है।
बगड़ावतों को नौलखा बाग के पास दो शराब से भरी हुई झीलों का पता चलता हैं। वह शराब की झीलें पातु कलाली की होती है जो दारु बनाने का व्यवसाय करती है। दारु की झीलों का नाम सावन-भादवा होता है, जिनमें काफी मात्रा में दारु भरी होती है। सवाई भोज नियाजी और छोछू भाट के साथ पातु कलाली के पास शराब खरीदने जाते हैं। पातु कलाली के घर के बाहर एक नगाड़ा रखा होता है, जिसे दारु खरीदने वाला बजाकर पातु कलाली को बताता है कि कोई दारु खरीदने के लिये आया है। नगाड़ा बजाने वाला जितनी बार नगाड़े पर चोट करेगा वह उतने लाख की दारु पातु से खरीदेगा।   नौलखा बाग में बगड़ावत.......

छोछू भाट तो नगाड़े पर चोट पर चोट करे जाते हैं। यह देख पातु सोचती है कि इतनी दारु खरीदने के लिये आज कौन आया है? 
पातु कलाली बाहर आकर देखती है कि दो घुड़सवार दारु खरीदने आये हैं। पातु कहती है कि मेरी दारु मंहगी है। पूरे मेवाड में कहीं नहीं मिलेगी। केसर कस्तूरी से भी अच्छी है यह, तुम नहीं खरीद सकोगे। नियाजी और सवाई भोज अपने घोड़े के सोने के जेवर उतारकर पातु को देते हैं और दारु देने के लिये कहते हैं।
पातु दारु देने से पहले सोने के जेवर सुनार के पास जांचने के लिए भेजती है। सुनार सोने की जांज करता है और बताता है कि जेवर बहुत कीमती है। जेवर की परख हो जाने के बाद पातु नौलखा बाग में बैठाकर बगड़ावतों को खूब दारु पिलाती है।
इधर माली की शिकायत सुनकर रावजी नीमदेवजी को नौलखा बाग में भेजते हैं। रास्ते में उन्हें नियाजी दिखते हैं जो अपने घोड़े के ताजणे से एक सूअर का शिकार कर रहे होते हैं। नौलखा बाग में बगड़ावत.......
नीमदेवजी यह देखकर उनसे प्रभावित हो जाते हैं और पास जाकर उनका परिचय लेते हैं। यहीं नियाजी और नीमदेवजी की पहली मुलाकात होती है।   
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Friday, November 22, 2019

गुर्जर समाज – संक्षिप्त इतिहास

गुर्जर समाज – संक्षिप्त इतिहास

गुर्जर समाज – संक्षिप्त इतिहास


गुर्जर समाज, प्राचीन एवं प्रतिष्ठित समाज में से एक है। यह समुदाय गुज्जर, गूजर, गोजर, गुर्जर, गूर्जर और वीर गुर्जर नाम से भी जाना जाता है। मुख्यत: गुर्जर उत्तर भारत, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में बसे हैं। इस जाति का नाम अफ़गानिस्तान के राष्ट्रगान में भी आता है। गुर्जरों के ऐतिहासिक प्रभाव के कारण उत्तर भारत और पाकिस्तान के बहुत से स्थान गुर्जर जाति के नाम पर रखे गए हैं, जैसे कि भारत का गुजरात राज्य, पाकिस्तानी पंजाब का गुजरात ज़िला और गुजराँवाला ज़िला, और रावलपिंडी ज़िले का गूजर ख़ान शहर।

गुर्जर अभिलेखो के हिसाब से ये सूर्यवंशी या रघुवंशी है। प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जरो को रघुकुल-तिलक तथा रघुग्रामिणी कहा है। 7वीं से 10वीं शताब्दी के गुर्जर शिलालेखो पर सूर्यदेव की कलाकृतियाँ भी इनके सूर्यवन्शी होने की पुष्टि करती है। राजस्थान में आज भी गुर्जरो को सम्मान से 'मिहिर' बोलते है, जिसका अर्थ 'सूर्य' होता है। कुछ इतिहासकारो के अनुसार गुर्जर मध्य एशिया के कॉकस क्षेत्र (अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए आर्य योद्धा थे। कुछ जानकार इन्हे विदेशी भी बताते है क्योंकि गुर्जरो का नाम एक अभिलेख मे हूणों के साथ मिलता है, परन्तु इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नही है। संस्कृत के विद्वानों के अनुसार, गुर्जर शुद्ध संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ 'शत्रु का नाश करने वाला' अर्थात 'शत्रु विनाशक' होता है। प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जर नरेश महिपाल को अपने महाकाव्य मे दहाडता गुर्जर कह कर सम्बोधित किया है। कुछ इतिहासकार कुषाणों को गुर्जर बताते है तथा कनिष्क के रबातक शिलालेख पर अन्कित 'गुसुर' को गुर्जर का ही एक रूप बताते है। उनका मानना है कि गुशुर या गुर्जर तो विजेता के रूप मे भारत मे आये क्योंकि गुशुर का अर्थ 'उच्च कुलिन' होता है। गुर्जर साम्राज्य इतिहास के अनुसार 5 वी शदी मे भीनमाल गुर्जर सम्राज्य की राजधानी थी तथा इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी। भरुच का सम्राज्य भी गुर्जरो के अधीन था। चीनी यात्री ह्वेन्सान्ग अपने लेखो मे गुर्जर सम्राज्य का उल्लेख करता है तथा इसे 'kiu-che-lo' बोलता है। छठी से 12 वीं सदी में गुर्जर कई जगह सत्ता में थे। गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी। मिहिरभोज को गुर्जर- प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बंगाल के पाल वंश और दक्षिण-भारत के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी। 12वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए। अरब आक्रान्तो ने गुर्जरो की शक्ति तथा प्रसाशन की अपने अभिलेखो मे भूरि-भूरि प्रशंसा की है। इतिहासकार बताते है कि मुगल काल से पहले तक लगभग पूरा राजस्थान तथा गुजरात, गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भूमि के नाम से जाना जाता था।  अरब लेखकों के अनुसार गुर्जर उनके सबसे भयंकर शत्रु थे तथा उन्होंने ये भी कहा है कि अगर गुर्जर नहीं होते तो वो भारत पर 12वीं सदी से पहले ही अधिकार कर लेते। 18वीं सदी में भी गुर्जरो के कुछ छोटे छोटे राज्य थे। दादरी के गुर्जर राजा, दरगाही सिन्ह के अधीन 133 ग्राम थे। मेरठ का राजा गुर्जर नैन सिंह था तथा उसने परीक्षितगढ़ का पुननिर्माण करवाया था। भारत गजीटेयर के अनुसार 1857 की क्रान्ति मे, गुर्जर तथा मुसलमान् राजपूत, ब्रिटिश के बहुत बुरे दुश्मन साबित हुए। गुर्जरो का 1857 की क्रान्ति मे भी अहम योगदान रहा है। कोतवाल धन सिंह गुर्जर 1857 की क्रान्ति का शहीद था।

प्राचीन काल में युद्ध कला में निपुण रहे गुर्जर मुख्य रूप से खेती और पशुपालन के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। गुर्जर अच्छे योद्धा माने जाते थे और इसीलिए भारतीय सेना में अभी भी इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है। गुर्जर महाराष्ट्र (जलगाँव जिला), दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में फैले हुए हैं। राजस्थान में सारे गुर्जर हिन्दु हैं। सामान्यत: गुर्जर हिन्दु, सिख, मुस्लिम आदि सभी धर्मो मे देखे जा सकते हैं। मुस्लिम तथा सिख गुर्जर, हिन्दु गुर्जरो से ही परिवर्तित हुए थे। पाकिस्तान में गुजरावालां, फैसलाबाद और लाहौर के आसपास इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है।