बगडावत कथा -18


रानी जयमती ने सवाई भोज को अपने पास महल में ही चौपड़ में उलझाए रखा और युद्ध भूमि में जाने नहीं दिया। सारे भाईयों की मौत के बाद सवाई भोज खुद रण क्षेत्र में जाने की तैयारी करते हैं। रानी जयमती से अपने अस्र-शस्र मांगते हैं तो रानी वहां पर भी एक वर मांगती है कि मैं भी आपके साथ युद्ध में चलूंगी और आपके पीछे बुंली घोड़ी पर सवार रहूंगी मगर आप पीछे मुड़कर मेरी ओर नहीं देखनानहीं तो मैं आपका सिर उतार लूंगी। यह वचन देने के बाद रानी सवाई भोज को उनके अस्र-शस्र देती है। सवाई भोज अपनी सेना को साथ लेकर युद्ध करने के लिये राठोडा की पाल पर पहुंच जाते हैं। रावजी के सामने जाकर उनके ऊपर तलवार से हमला करते हैं। रानी जयमती अपना हाथ आगे कर देती हैंजिससे उसके हाथों की चूड़ियां कट जाती है। सवाई भोज पीछे मुड़ कर कहते है ये क्या करती हो रानी सा अभी आप का हाथ कट जाता। रानी कहती है की लाओ मेरा वचन पूरा करोआपने वचन दिया था कि पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा इतना सुनते ही सवाई भोज खुद अपना सिर काट कर रानी को दे देते हैं। सवाई भोज की मौत की खबर सुनकर सवाई भोज की दूसरी रानियाँ भी वहाँ आ जाती हैं और हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती हैं। मगर पदमादेजो मेहन्दु जी की माँ थी उन्होनेसाडू माता को हाथ जोड़ने से मना कर दिया। वहीं भवानीचौबीस भाईयों की मुण्ड माला बना रही थी। इधर रावजी कहते हैं भाई राणी कहां हैराणी के लिये ही तो युद्ध किया है। रावजी के इतना कहते ही पेड़ पर बैठी भवानी बोलती है राजाजी ऊपर देखोरावजी देखकर घबरा जाते है। रानी जयमती भवानी का रुप धारण कर गले में मुण्ड माला धारण कर २० भुजाओं युक्त सिंह पर सवार बड़ के पेड़ पर बैठी हुई है। यह रुप देख रावजी और नीमदेव घबरा जाते हैं। रावजी को रानी के विराट रुप के दर्शन करने के बाद रावजी पछताते हैं कि हमने ऐसे ही अपने भाईयों को खत्म कर दिया है। बगड़ावतों के मरने के बाद उनकी सम्पत्ति की लूट मच जाती है। कश्मीरी तम्बू तो मन्दसोर का मियां ले जाता हैजय मंगला और गज मंगला हाथी पीलोदा के कुम्हार ले गये और सवाई भोज की बुंली घोड़ी सावर के ठाकुर दिया जी ले जाते हैं। सोने का पोरसा पहले ही तेजाजी लेकर चले गये थे और बगड़ावतों की अच्छी नस्ल की गायें नापा ग्वाल गोसमा डूगंरा में ले गया। रावजी नीमदेव से कहते हैं कि सब सामान तो लोग लूट कर ले गये हैं। उन्हें बगड़ावतों के मारे जाने का अफसोस होता है और कहते हैं कि ऐसे भाई कहां मिलेगें। और यह महसूस करते हैं कि यह सब भवानी की माया है जो बगड़ावत मारे गये। सारी रानियों के सती होने के साथ पदमादे भी सती हो जाती है और साडू माता को सती होने से मना कर देती है क्योंकि भगवान ने अभी उनके यहाँ जन्म लेना है। सभी बगड़ावतों की रानियों के सती होने के बादसाडू माता हीरा दासी को साथ लेकर मालासेरी की डूगंरी पर रहने आ जाती है। अब रावजी कहते हैं कि बगड़ावतों के बालक टाबर हो तो उन्हें मैं पाल-पोस कर बड़ा करूं और वापस बगड़ावत खड़े करूं। यह बात छोछू भाट का मौसेरा भाई गांगा भाट सुन लेता है। उसे पता होता है कि बगड़ावतों के ७ बीसी कुमारों ( १४० कुमारको छोछू भाटभाट मगरें में पाल रहा है। रावजी जब अपनी सेना के साथ भाट मंगरे पहुंचते हैंवहां छोछू भाट मंगरे पर बैठा देखता है कि सेना आ रही है तो सभी ७ बीसी राजकुमारों को मंगरे में छोड़ कर भाग जाता है। कालूमीर पठान रावजी से कहते हैं कि रावजी इनको पालने की गलती मत करनाइन्हें यहीं मार देते हैंनहीं तो ये बड़े होकर अपने बाप-दादों का बैर आपसे लेगें। और कालूमीर कहता है कि रावजी २४ बगड़ावतों से युद्ध करते-करते  - ८ महीने हो गयेये तो पूरे १४०है इनसे कैसे निपटेगें। रावजी कालूमीर पठान की बात मान जाते है और उन्हें मारने का आदेश दे देते हैं। कालूमीर पठान उन बच्चों को वहीं मार देता है। उनमें से एक बच्चा बच जाता है भूणाजीउसे पत्थर पर पटक देते हैं लेकिन वह बच्चा नहीं मरता है। (इन्हें लक्ष्मण का अवतार बताया गया है।जब भूणाजी नहीं मरता हैं तो रावजी उसे अपना पीण्डी पाछ बेटा बना लेते हैंअपनी पीड़ली के चीरा लगाकर एक दूसरे का खून आपस में मिला कर धरम बेटा बना लेते हैं। भूणाजी को लाकर रावजी अपनी रानी को देते हैं और कहते हैं कि इसे भी राजकुमारी तारादे के साथ-साथ अपना दूध पिलाओ और पाल-पोस कर बड़ा करो। रानी अपने स्थनो के जहर लगाकर भूणाजी को दूध पिलाती हैभूणाजी फिर भी नहीं मरते। आखिर रानी भूणाजी को हाथी के पावों से कुचलवाने को कहती हैहाथी उन्हें अपनी सूण्ड से उठाकर अपनी पीठ पर बैठा लेता है। यह सब देख कर रानीजी के भाई चान्दारुण के रहने वाले सातल-पातलभूणाजी की चंटी अंगुली काटकर उन्हें खाण्डेराव का नाम देते हैं। सातल-पातल भूणाजी की अंगुली काटते समय यह कहते हैं की भाण्जे जब तू बड़ा हो जावे तब तेरे में ताकत हो तो हमसे बैर ले लेना। ये बात वहां बैठा एक पून्या जाट सुन लेता है और इस बात को गांठ बांध लेता हैवक्त आने पर भूणाजी को बता इस तरह बगड़ावतों के मारे जाने पर सारा परिवार अलग-अलग हो गया। रावजी ने बगड़ावतों के  बीसी कुमारों को भी मरवा दिया। उनके परिवार के बचे हुए ४ कुमार अलग-अलग जगह पर पले बढ़े। जिनमें सबसे बड़े मेहन्दू जी अजमेर मेंतेजाजी के बेटे मदनों जी उनके पास पाटन मेंभूणा जी राण में और भांगीजी बाबा रुपनाथ के पास ही पले बढ़े।