वीर बगड़ावत कथा  देवनारायण- 4

अपने घर आकर सवाईभोज बाबा रुपनाथ व सोने के पोरसे की सारी घटना अपने भाइयों एवं परिवार वालों को बताते हैं। इस अथाह सम्पत्ति का क्या करें यह विचार करते हैं। इतना सारा धन प्राप्त हो जाने पर सभी बगड़ावत अपना पशुधन और बढ़ाते हैं। सभी अपने लिये घोड़े खरीदते हैंऔर सभी घोड़ो के लिये सोने के जेवर बनवाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि बगड़ावत अपने सभी घोड़ों के सोने के जेवर कच्चे सूत के धागे में पिरोकर बनाते थे। उनके घोड़े जब भी दौड़ते थे तब वह जेवर टूट कर गिरते रहते थे और वे दोबारा जेवर बनवाते रहते थे।आज भी ये जेवर कभी-कभी बगड़ावतों के गांवो के ठिकानों से मिलते हैं। बगड़ावत खूब जमीन खरीदते हैं। और अपने अलग-अलग गांव बसाते हैं। सवाई भोज अपने गांव का नाम गोठां रखते हैं। बगड़ावत काफी धार्मिक काम करते हैं। तालाब और बावड़ियां बनवाते हैं और जनहित में कई काम करते हैं। बगड़ावतों के पास काफी सम्पत्ति होने से वो काफी पैसा शराब खरीदने पर भी खर्च करते हैं और अपने घोड़ो को भी शराब पिलाते हैं। एक बार सवाईभोज अपने भाइयों के साथ अपने राजा (रावजी) से मिलने जाने की योजना बनाते हैं। अपने सभी घोड़ो को सोने के जेवर पहनाते हैं। साडू माता नियाजी से पूछती है कि इतनी रात को कहाँ जाने की तैयारी है।

 पूरे मेवाड में कहीं नहीं मिलेगी। केसर कस्तूरी से भी अच्छी है यह, तुम नहीं खरीद सकोगे। नियाजी और सवाई भोज अपने घोड़े के सोने के जेवर उतारकर पातु को देते हैं और दारु देने के लिये कहते हैं। पातु दारु देने से पहले सोने के जेवर सुनार के पास जांचने के लिए भेजती है। सुनार सोने की जांच करता है और बताता है कि जेवर बहुत कीमती है। जेवर की परख हो जाने के बाद पातु नौलखा बाग में बैठाकर बगड़ावतों को दारु देती है। इधर माली की शिकायत सुनकर रावजी नीमदेवजी को नौलखा बाग में भेजते हैं। रास्ते में उन्हें नियाजी दिखते हैं जो अपने घोड़े के ताजणे से एक सूअर का शिकार कर रहेहोते हैं। नीमदेवजी यह देखकर उनसे प्रभावित हो जाते हैं और पास जाकर उनका परिचय लेते हैं। यहीं नियाजी और नीमदेवजी की पहली मुलाकात होती है।