अमर मातृत्व   पन्ना धाय 
पन्नाधाय 


 महा बलिदानी पन्नाधाय का जन्मदिन भी है। 8 मार्च 1501ई. को चित्तोड़ के पास पांडोली गांव में हरचंद गुर्जर के यहाँ पन्ना का जन्म हुआ था।
पन्ना धाय राणा सांगा के पुत्र राणा उदयसिंह की धाय माँ थीं। पन्ना धाय किसी राजपरिवार की सदस्य नहीं थीं।वह गुर्जर परिवार से थी! अपना सर्वस्व स्वामी को अर्पण करने वाली वीरांगना पन्ना धाय का ससुराल कमेरी गावँ जिला-राजसमंद राजस्थान में गुर्जर परिवार में था। राणा साँगा के पुत्र उदयसिंह को माँ के स्थान पर दूध पिलाने के कारण पन्ना 'धाय माँ' कहलाई थी।
पन्ना का पुत्र चन्दन और राजकुमार उदयसिंह साथ-साथ बड़े हुए थे। उदयसिंह को पन्ना ने अपने पुत्र के समान पाला था। पन्नाधाय ने उदयसिंह की माँ रानी कर्णावती के सामूहिक आत्म बलिदान द्वारा स्वर्गारोहण पर बालक की परवरिश करने का दायित्व संभाला था। पन्ना ने पूरी लगन से बालक की परवरिश और सुरक्षा की। पन्ना चित्तौड़ के कुम्भा महल में रहती थी।
चित्तौड़ का शासक, दासी का पुत्र बनवीर बनना चाहता था। उसने राणा के वंशजों को एक-एक कर मार डाला। बनवीर एक रात महाराजा विक्रमादित्य की हत्या करके उदयसिंह को मारने के लिए उसके महल की ओर चल पड़ा। एक विश्वस्त सेवक द्वारा पन्ना धाय को इसकी पूर्व सूचना मिल गई। पन्ना राजवंश और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग थी व उदयसिंह को बचाना चाहती थी। उसने उदयसिंह को एक बांस की टोकरी में सुलाकर उसे झूठी पत्तलों से ढककर एक विश्वास पात्र सेवक”कीरत बारी” के साथ महल से बाहर भेज दिया। बनवीर को धोखा देने के उद्देश्य से अपने पुत्र चंदन को उदयसिंह के पलंग पर सुला दिया। बनवीर रक्तरंजित तलवार लिए उदयसिंह के कक्ष में आया और उसके बारे में पूछा। पन्ना ने उदयसिंह के पलंग की ओर संकेत किया जिस पर उसका पुत्र चंदन सोया था। बनवीर ने पन्ना के पुत्र को उदयसिंह समझकर मार डाला। पन्ना अपनी आँखों के सामने अपने पुत्र के वध को अविचलित रूप से देखती रही। बनवीर को पता न लगे इसलिए वह आंसू भी नहीं बहा पाई। बनवीर के जाने के बाद अपने मृत पुत्र की लाश को चूमकर राजकुमार को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए निकल पड़ी। स्वामिभक्त वीरांगना पन्ना धन्य हैं! जिसने अपने कर्तव्य-पूर्ति में अपनी आँखों के तारे पुत्र चंदन का बलिदान देकर मेवाड़ राजवंश को बचाया।
पुत्र की मृत्यु के बाद पन्ना उदयसिंह को लेकर बहुत दिनों तक सप्ताह शरण के लिए भटकती रही पर दुष्ट बनबीर के खतरे के डर से कई राजकुल जिन्हें पन्ना को आश्रय देना चाहिए था, उन्होंने पन्ना को आश्रय नहीं दिया। पन्ना जगह-जगह राजद्रोहियों से बचती, कतराती तथा स्वामिभक्त प्रतीत होने वाले प्रजाजनों के सामने अपने को ज़ाहिर करती भटकती रही। कुम्भलगढ़ में उसे यह जाने बिना कि उसकी भवितव्यता क्या है शरण मिल गयी। उदयसिंह क़िलेदार का भांजा बनकर बड़ा हुआ। तेरह वर्ष की आयु में मेवाड़ी उमरावों ने उदयसिंह को अपना राजा स्वीकार कर लिया और उसका राज्याभिषेक कर दिया। उदय सिंह 1542 में मेवाड़ के वैधानिक महाराणा बन गए।
मेवाड़ के इतिहास में जिस गौरव के साथ प्रात: स्मरणीय महाराणा प्रताप को याद किया जाता है, उसी गौरव के साथ पन्ना धाय का नाम भी लिया जाता है, जिसने स्वामीभक्ति को सर्वोपरि मानते हुए अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दे दिया था। इतिहास में पन्ना धाय का नाम स्वामिभक्ति के शिरमोरों में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है।
अब हम उसी देवी के जीवन पर प्रकाश डालना चाहेंगे, क्योंकि भारत के मध्यकालीन स्वातंत्रय समर का इतिहास तब तक अधूरा ही माना जाएगा जब तक इस वीरांगना और कर्तव्यनिष्ठ  संन्यासी जीवन को और उसके व्यक्तित्व को लोगों के सामने प्रकट नही किया जाएगा।
एक शंका हो सकती है कि इस सन्नारी का देश की स्वाधीनता की लड़ाई से क्या अभिप्राय है? अथवा क्या और कैसा संबंध है? तब हमें तनिक विचार करना चाहिए कि यदि पन्नाधाय ना होती तो राणा उदय सिंह ना होते और यदि राणा उदयसिंह ना होते तो महाराणा प्रताप भी नही होते। इस प्रकार महाराणा प्रताप की निर्मिती में सीधे-सीधे पन्नाधाय का प्रशंसनीय योगदान है। इसलिए उसे मध्यकालीन स्वातंत्रय समर की एक ऐसी अमर साधिका माना जाना चाहिए जिसने अपने राष्ट्र धर्म को सर्वोपरि मानकर उसके लिए ऐसा त्याग किया कि उस जैसा अन्य कोई उदाहरण मिलना विश्व इतिहास में भी दुर्लभ है।
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