बगडावत  कथा -13

जब रावजी शिकार से वापस लौटते हैं, तब महल में रानी के गहने पड़े हुए देखते है। उन्हें नीमदेजी कहते हैं कि भाई, बगड़ावत रानी सा को भगाकर ले गये हैं। ये बात सुनकर रावजी को यकीन नहीं होता और कहते हैं वो तो हमारे भायले है वो ऐसा नहीं कर सकते हैं। जब चारों ओर साड़ीवान ( सवारसंदेश वाहक) दौड़ाए जाते हैं कि रानी सा का पता लगाओ। रावजी को संदेश वाहक से पता चलता है कि रानी सा तो बगड़ावतों के यहां गोठां में है तब जाकर रावजी को विश्वास होता है कि बगड़ावत रानी को भगाकर ले गये हैं। रावजी नियाजी को एक परवाना लिखकर भेजते हैं कि भाई राणी को वापस भेज दो। नियाजी जवाब में रावजी को पत्र लिखते हैं कि हमने तो रानी शिवजी के चढ़ा दी है और आपको रानी चाहिए तो दूसरा ब्याह कर लो। दूसरा परवाना रावजी ने बाघजी को लिखा कि रानी ने ले ग्या बेटा बाघ का, नियाजी को समझा कर रानी को वापस भेजो। बाघजी ने रावजी को जवाब लिख भेजा कि रानी तो शिवजी को चढ़ा दी है। और आपको रानी चाहिए तो दूसरा ब्याह कर लो। रावजी बगड़ावतों को समझाने का खूब प्रयास करते हैं कि रानी सा को वापस राण पहुंचा दो नहीं तो अन्जाम बुरा होगा। जो भी बगड़ावतों के पूर्वज थे उनके माध्यम से (बिसलदेवजी, बाघ सिंघ जी और कई राजाओं, सामन्तों के साथ) संदेश भेज बगड़ावतों को समझाने के प्रयास किये गये मगर बगड़ावत अपनी बात पर अड़े रहते हैं। अब रावजी एक संदेश बाबा रुपनाथ के यहां भेजते हैं कि आप के चेले बगड़ावत रानी को ले गए हैं, आप उन्हें समझाइए कि वे रानी को वापस भेज दें। बाबा रुपनाथ रावजी को जवाब देते हैं कि रानी तो अब हमारी शरण में आ चुकी है। आपको अगर लड़ाई करनी है तो पहले रुपायली पर हमला करो। बगड़ावतों तक जाने की जरुरत ही नही है। फिर बाबा रुपनाथ बगड़ावतों को संदेश भेजते हैं कि आप सब लोग लड़ाई की तैयारी कर लो। रावजी से युद्ध करना है। अब चाहे जो हो जाये, रानीजी को वापस नहीं भेजना है। सभी बगड़ावत अपने गुरु का संदेश पढ़कर जोश से भर जाते हैं। एक संदेश तेजाजी को पाटन की कचहरी में भी भेजा जाता है और तेजाजी भी युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं। लड़ाई शुरु करने से पहले बगड़ावत अपने सभी सामन्तों को सन्देशवाहक भेजकर फौज इकट्ठी कर लेते हैं और दुगने जोश से युद्ध की तैयारी के लिये अपने-अपने खैड़ो पर पहुंच जाते हैं। रानी जयमती को दिये वचन के अनुसार सभी भाईयो को अलग-अलग अपने खैड़ो से ही लड़ाई लड़नी थी। इधर रावजी अपने ५२ गढ़ो के खास सामन्तो जिनमें दियाजी, कालूमीर पठान, टोडा का सोलंकी, इत्यादि के साथ अपनी सेना को रुपायली में पहला हमला (बाबा रुपनाथ पर) करने भेजते हैं। वहां बाबा रुपनाथजी अपने सभी नागा साधुओं की फौज के साथ युद्ध के लिये तैयार होते है। बाबा रुपनाथजी रावजी की फौज को आते देख अपने पालतु कुत्तो को खुला छोड़ देते है। गाथा के अनुसार इनकी संख्या ५०० बताई गई है। रावजी की फौज इन कुत्तो के हमले से घबरा जाती है। ऊपर से नागा साधुओं के हमले से भाग छूटती है। और रावजी के यहां वापस लौट आती है। उनके कई सैनिक इस लड़ाई में मारे जाते हैं।




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