ONLINE GURUJI: March 2019

Gurjar History

Sunday, March 24, 2019

बगडावत कथा -17



बगडावत  कथा -17


रण क्षेत्र में नियाजी के पास रानी जयमती (भवानी) आती है और कहती है कि नियाजी मुझे अपना शीश दे दीजिए। आपने वचन दिया था कि मैं एक बार आपसे जो भी मांगूगीं आप मुझे वो दे देंगे। नियाजी अपने हाथ से ही अपना शीश काटकर भवानी के थाल में रखकर देते हैं और कहते हैं कि भाभीजी मेरा वचन पूरा हो गया। नियाजी का सिर कटने के बाद उनकी छाती में आँखे निकल आती हैं, नाभि की जगह मुँह बन जाता है और गले के ऊपर कमल का फूल खिल जाता है। सिर कटने के बाद भी नियाजी अपने दोनों हाथों से हाथियों की पूंछ पकड़कर घुमा-घुमाकर फेंक देते हैं। जिनके नीचे दबकर कई सैनिक मर जाते हैं। भवानी नियाजी से कहती है कि आपका माथा कटने के बाद भी आप लड़े जा रहे हैं और कहती है कि माथा तो है नहीं मैं आपकी आरती करूं तो तिलक कहाँ करूं। नियाजी कहते हैं माताजी मैं आपको मान गया हूं। बस आपने आरती कर ली। भवानी सोचती है कि यह तो अभी रुकेगा नहीं। भवानी सोचती है कि यह तो सिर कटने के बाद भी लड़ता जा रहा है इसलिए क्यों न मैं इसे नील का छींटा दे दूँ (जो कि अशुभ होता है) जिससे नियाजी खाण्डा डाल देंगे। नियाजी को भवानी की बात समझ आ जाती है और उनकी वाणी होती है कि भाभीजी मेरे ऊपर नील का छींटा मत डालना। इससे मेरा मोक्ष नहीं होगा। मैं खाण्डा डाल देता हूँ लेकिन माँ चामुण्डा मेरा वंश खत्म मत करना जैसे तूने भूणाजी, मेहन्दू जी और मदनो जी को छोड़ा है वैसे मेरे वंश को छोड़ देना। इस पर भवानी नेतुजी के ६ महीने के गर्भ को जीवित छोड़ देने का वचन देती है। नियाजी अब खाण्डा छोड़ देते हैं और पृथ्वी माता से निवेदन करते हैं कि मुझे धरती में समा ले। जब सवाई भोज को नियाजी की मौत का पता लगता है तो वह भवानी को कोसते हैं कि तू मेरे निया जैसे भाई को खा गई। भवानी कहती है कि मैं तो डायन हूं। नियाजी की क्या सोच करते हो, मैं तो द्रौपदी बनकर कौरवों और पाण्डवों को खा गई, मेरा तो काम ही यही है। सवाई भोज कहते हैं कि नियाजी जैसा भाई तो मुझे कभी नहीं मिल सकता। वह मेरे २२ भाइयों के बराबर एक ही था। भवानी कहती है कि मैं कई देवी देवताओं को खा गई, तू एक नियाजी की क्या बात करता है। मैं तो बड़े- बड़ों को खा गई। सवाई भोज कहते हैं कि माँ चामुण्डा दूर रह ये तेरी करनी मुझे जचीं नही मुझे। नियाजी के बाद रण भूमि में बाहरावत जी अपनी सेना के साथ युद्ध करने के लिए आते हैं और वो भी लड़ाई करते हुए मारे जाते हैं। नियाजी और बाहरावतजी की तरह सभी भाई एक-एक करके रावजी की फौजों से युद्ध करने के लिए खारी नदी पर आए। खारी नदी पर ही सब युद्ध हुए थे। खारी नदी के एक किनारे पर रावजी की फौजें थी तो दूसरी और बगड़ावतों की फौजें। यह युद्ध कलयुग का महाभारत का युद्ध था। इस युद्ध में सवाई भोज के सभी महाबली योद्धा भाई काम आ गए। रानी को दिए वचन के अनुसार एक-एक भाई ने अपनी फौज के साथ खारी नदी पर आकर रावजी की सेना के साथ युद्ध किया था। इन बगड़ावत भाइयों की रानियाँ सतीवाड़े में सती होती हैं। चूंकि नेतुजी ६ महीने के गर्भ से थी इस अवस्था में वह सती नहीं हो सकती थी, इसलिए वह बगड़ावतों के गुरु बाबा रुपनाथ की धूणी पर आती है और कहती है बाबाजी इस पेट में लोथ पल रहा है इसे निकाल कर आप अपने पास रख लो। बाबा रुपनाथ कहते है, मैं तेरे हाथ नहीं लगा सकता क्योंकि तू मेरे चेले की रानी है, मैने तेरे हाथ का खूब भोजन किया है, और यदि मैं तेरे को हाथ लगाता हूँ तो अगले जन्म में मैं सूअर बनूंगा। यह सुनकर नेतुजी खुद ही अपना पेट चीरकर गर्भ बाहर निकाल कर बाबा को देती है और बाबा उसे अपने पास रखे भांग के घड़े में डाल देते हैं और ढक देते हैं। नेतुजी कहती है बाबा जी अब आप ही इसके मां-बाप हो और इसकी सुरक्षा आपकी जिम्मेदारी है। यह कहकर नेतुजी अपनी कमर को वापस बांध लेती है और कहती है तीन महीने बाद इसका जन्म होगा और इसका नाम भांगड़े खान रखना। नेतुजी बाबा रुपनाथजी से कहती है इस बच्चे को साधू मत बनाना। और इसको सफेद कपड़े देना, भगवा वस्र मत पहनाना। राताकोट की जीत यही करेगा, यह बड़ा होकर अपने बाप का बैर लेगा। यह एक नया बदनोरा गांव बसायेगा। बाबा से आज्ञा लेकर नेतु वहां से सती होने के लिये जाती है जहां सभी बगड़ावत भाईयों की स्रियाँ नहा धोकर १६ श्रृंगार कर सती होने के लिए अपने-अपने पति के शवों के साथ चिता में बैठ जाती हैं। सती होते समय नेतु रानी जयमती को श्राप देती है कि अगले जनम में तू बड़े घर में जन्म लेगी तेरे शरीर पर कोढ झरेगा, तेरे सिर पर सींग होगा और तेरे से शादी करने वाला कोई नहीं मिलेगा। रानी श्राप से भयभीत हो जाती है और नेतु से कहती है की मेरा उद्धार कैसे होगा। विनती करती है।नेतु कहती है कि पीपलदे के नाम से तू धार के राजा के यहां जन्म लेगी और भगवान देवनारायण मालवा से लौटते समय तेरा उद्धार करेगें।




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बगडावत कथा -16




                       
बगडावत कथा -16

बाबा रुपनाथजी निया से कहते हैं कि निया सब पहर का युद्ध करने के बाद सीधा तू मेरे पास आना। नियाजी कहते है बाबा गुरुजी मैदान से दिन भर की लड़ाई के बाद थक जाउंगा। ७ कोस चलकर आप के पास आना तो मुमकिन नहीं है। बाबा रुपनाथजी कहते है कि तेरी बात सही है, मैं ही तेरे साथ चलता हूं और नेगदिया में ही धूणी रमाता हूँ बाबा रुपनाथ और नियाजी साथ-साथ नेगदिया आ जाते हैं। बाबा रुपनाथ नेगदिया गांव के बाहर ही अपनी धूणी लगा लेते हैं। शंकर भगवान के अवतार बाबा रुपनाथ जी नियाजी को आशीर्वाद देकर युद्ध के लिये विदा करते हैं। और जब तक नियाजी युद्ध करते हैं तब तक नेगदिया छोड़ कर नहीं जाते हैं। हर सुबह सूरज उगने के साथ नियाजी रण का डंका बजा कर रावजी की सेना पर टूट पड़ते और कई सैनिको और सामंतो को मार डालते। रावजी के खास निजाम ताजूखां पठान, और अजमल खां पठान की १२ हजार सेना का सफाया कर नियाजी उनके सिर काट देते हैं। हर शाम नियाजी युद्ध भूमि से वापस लौटते समय अपने गुरु बाबा रुपनाथ जी की धूणी पर आते हैं। बाबा रुपनाथजी अपने हाथ का कड़ा नियाजी की देह पर घुमाते हैं और धूणी की राख लगाकर, अपने कमण्डल में से पानी के छीटें देते है जिससे नियांजी के सारे घाव भर जाते हैं और शरीर पर कहीं भी तलवार या भाले की चोट के निशान नहीं रहते हैं। बाबा रुपनाथ कहते हैं कि ये बात किसी को मत बताना, किसी को भी इसका जिक्र मत करना। अब बावड़ी पर स्नान कर शिवजी का ध्यान करके घर जाओ। नियाजी बावड़ी पर स्नान करते हैं, शिवजी का ध्यान कर रंग महल में आते हैं। नेतुजी उन्हें भोजन करवाती है, पंखा झलती है। नियाजी अगली सुबह वापस रण क्षेत्र में आ जाते हैं और युद्ध में मालवा के राजा को मार गिराते हैं। मन्दसोर के मियां मोहम्मद की फौजो का सफाया कर देते हैं। मियां का सिर काट देते हैं और वापस बाबा रुपनाथजी के पास आते हैं। और फिर बाबा रुपनाथजी नियाजी के ऊपर अपना लोहे का कड़ा घुमाते हैं, धूणी की राख लगाते हैं, पानी के छीटें देते हैं। नियाजी के सारे घाव फिर से भर जाते हैं। ये क्रम कई दिनों तक चलता रहता हैं। उधर तेजाजी बगड़ावतों के बड़े भाई युद्ध क्षेत्र मेंआते हैं। जब नियाजी से युद्ध करके जाने के बाद रावजी की सेना खाना बना रही होती है, रावजी के सैनिक बाट्या सेक रहे होते हैं। तब तेजाजी अपनी सेना के साथ युद्ध क्षेत्र में आते है उनकी बाट्या वगैरा सब बिखेर देते हैं और सेना में भगदड़ मचा कर वापस चले जाते हैं। दोनों भाईयों का ये क्रम ३-४ दिनों तक चलता रहता है।नियाजी को युद्ध करते हुए पांच महीने से भी ज्यादा समय हो जाता हैं। भवानी (जयमती) सोचती है कि ऐसी क्या बात है नियाजी लगातार युद्ध कर रहें हैं। पता लगाना चाहिये, और रानी नेतुजी के पास जाकर कहती है कि क्या बात है भाभी जी देवर नियाजी को पांच महीने से ज्यादा समय हो गया है युद्ध करते हुए, क्या तुमने इनके शरीर पर कहीं तलवार या भाले का निशान देखा है ? ऐसी क्या बात है ? वापस आते समय कपड़ो के ऊपर खून का निशान तक नहीं होता। इसका क्या कारण है ? देख पता करना और मुझे बताना। नेतु कहती है की रानी सा आज नियाजी के युद्ध से आने के बाद पता कर्रूंगी। शाम को नियाजी युद्ध क्षेत्र से बाबा रुपनाथ के पास जाकर रंग महल में वापस आते हैं। खाना खाते समय नेतु पंखा झलती हुई नियाजी से कहती है एक बात पूछती हूं। आपको कई दिन हो गये लड़ाई करते हुए, आपके शरीर पर मुझे कभी कोई तलवार का निशान या कपड़ो पर खून तक लगा न नहीं आया, क्या राज है ? इस बात को मुझे बताओ। नियाजी कहते है नेतु ये बात बताने की नहीं है और तू मत पूछ मैं नहीं बताऊगां। नेतु जिद करती है तो नियाजी कहते है कि ठीक है मैं तुझे बता देता हूं लेकिन ये किसी और को मत बताना। नेतु कहती है नहीं बताऊगीं। नियाजी बाबा रुपनाथ की सारी प्रक्रिया नेतु को बता देते हैं। और अगली सुबह वापस युद्ध करने चले जाते हैं। पीछे से रानी जयमती आती है और नेतु से पूछती है कि नियाजी से क्या बात हुई। नेतु पहले तो मना कर देती है। बहाना बना लेती है कि वह नियाजी से पूछना भूल गई। रानी जयमती नेतु को कहती है कि भाभीजी आप तो झूठ कभी नहीं बोलती हो आज झूठ क्यो बोल रही हो? नेतु कहती है कि रानी सा आप किसी को नही कहना और वो सारी बात जयमती को बता देती है कि बाबा रुपनाथजी के पास एक ऐसा कड़ा है जिसे उनके शरीर पर घुमाने से नियाजी के सारे घाव भर जाते हैं। रानी जयमती वहां से सीधी बाबा रुपनाथ की धूणी पर आती है। उन्हें प्रणाम कर वहां घड़ी दो घड़ी रुकती है और पता लगाती है कि बाबा रुपनाथजी वो कड़ा कहां रखते हैं। उसे पता चलता है कि कड़ा बाबा के आसन के नीचे रखा हुआ है। और वो अपनी माया से चील बन जाती है और बाबा के आसन के नीचे से कड़ा अपनी चोंच में उठा कर उड़ जाती है। बाबा रुपनाथजी समझ जाते हैं कि निया ने जरुर भेद खोल दिया है। जब नियाजी युद्ध करके लौटते है तो बाबा रुपनाथ उससे कहते हैं कि निया तूने भेद किसे बताया है। निया को अफसोस होता है और कहते हैं कि आखिर औरतों के पेट में कोई बात नहीं टिकती। और बाबा रुपनाथ को प्रणाम कर वापस रण क्षेत्र में लौट आते हैं।
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Thursday, March 21, 2019

गुर्जर समाज








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Wednesday, March 20, 2019

गुर्जर कर्मचारी अधिकारी परिषद




                          *GKAP*

*गुर्जर शिक्षा ज्योति*
(GKAP - गुर्जर कर्मचारी अधिकारी परिषद्)

विषय :- *Empowerment of Gurjar Community through Education*
(special reference to Rajasthan )

   

*GKAP :-*एक नजर :-

ऐतिहासिक वीर कौम - ‘गुर्जर समाज’ देश की आन-बान एवं शान की मिशाल रही है और देश की आजादी के बाद गुर्जर जाति में शिक्षा का अनुकरण नहीं हुआ, जिसके कारण यह कौम दिन प्रतिदिन पिछड़ कर राष्ट्रीय धारा से अलग-थलग पड़ गयी।

गुर्जर समाज की स्थिति का सन् 2007 में चोपड़ा आयोग ने सर्वे किया था और उस रिपोर्ट के निष्कर्ष में लिखा गया है कि ‘‘प्रदेश में विकास के छः दशक से अधिक समय के उपरान्त भी गुर्जर समुदाय की बस्तियों में आज तक विकास की एक भी किरण नहीं दिखाई देती है और राजस्थान की गुर्जर सुमादाय की बस्तियों में आज भी गरीबी, दरिद्रता और दीनता के टापू बनी हुई हैं। इस समुदाय की यह उपेक्षा निश्चित रूप से अस्वीकार्य है और इसके तुरन्त समाधान की आवश्यक्ता है। (चोपड़ा कमेटी रिपोर्ट 2007 पृष्ठ संख्या 182)

आप सभी को सूचित करते हुए हर्ष है कि पिछले एक दशक से राजस्थान में GKAP द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में कार्य किया जा रहा है। GKAP का मुख्य लक्ष्य है समाज के प्रतिभाशाली विद्यार्थी जो आर्थिक स्थिति एवं उचित मार्गदर्शन के अभाव के कारण आगे नहीं आ पा रहे हैं उन्हें उचित मंच प्रदान करना।


हमें बिना देरी किये समाज के होनहार बालक-बालिकाओं को शिक्षा एवं नौकरी हेतु प्रोत्साहित करना होगा, जिसके लिए प्रदेश के नौकरी पेशा समुह (यह समुह किसी भी समाज का चक्षु होता है) द्वारा गुर्जर कर्मचारी अधिकारी परिषद् राजस्थान का गठन कर अपने स्वयं के हितों की रक्षा को ध्यान में रखते हुए समाज के बालक-बालिकाओं की पढ़ाई की व्यवस्था हेतु गुर्जर शिक्षा ज्योति का गठन किया है।

 अतः राजस्थान के समस्त  संभागो में भी GKAP द्वारा समाज के विद्याथियों का मार्गदर्शन किया जाना चाहिए। जैसा कि GKAP का कार्य गुर्जर कर्मचारी अधिकारी परिषद है एवं सम्पूर्ण राजस्थान में इसके द्वारा विद्यार्थियों के लिए कार्य किया जा रहा है।

 समाज के समस्त कर्मचारी अधिकारी एक मंच पर एकत्रित होकर शिक्षा के क्षेत्र में मंथन कर आने वाली युवा पीढ़ी को उचित सहायता एवं मार्गदर्शन प्रदान करें|

अतः आप सभी से निवेदन एवं अनुरोध हैैं कि राजस्थान के समस्त  संभाग की आने वाली युवा पीढ़ी के उन्नयन एवं मार्गदर्शन, विचार -विमर्श व मार्गदर्शन हेतु राज्य स्तरीय GKAP के सक्रीय अधिकारी एवं कर्मचारी अधिकाधिक संख्या मे  जुङे!

http://www.Gkap.org   इस लिंक व ब्लॉग www.Gkap.org https://gurjarithas.blogspot.com/2019/03/www.html

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गुर्जर इतिहास

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भारत में कुषाण पहचान की निरंतरता- कसाना गुर्जरों के गांवों का सर्वेक्षण

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अक्सर यह कहा जाता हैं कि कनिष्क महान से सम्बंधित ऐतिहासिक कुषाण वंश अपनी पहचान भूल कर भारतीय आबादी में विलीन हो गया| किन्तु यह सत्य नहीं हैं| अलेक्जेंडर ने आर्केलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, खंड 2’, 1864  में कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की है| यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक हैं कि ऐतिहासिक कुषाणों से इतिहासकारों का मतलब केवल कुषाण वंश से नहीं बल्कि तमाम उन भाई-बंद कुल, वंश, नख और कबीलों के परिसंघ से हैं जिनका नेतृत्व कुषाण कर रहे थे| कनिंघम के अनुसार आधुनिक कसाना गुर्जर राजसी कुषाणों के प्रतिनिधि हैं तथा आज भी सिंध सागर दोआब और यमुना के किनारे पाये जाते हैं| कुषाण सम्राट कनिष्क ने रबाटक अभिलेख में अपनी भाषा का नाम आर्य बताया हैं| सम्राट कनिष्क ने अपने अभिलेखों और सिक्को पर अपनी आर्य भाषा (बाख्त्री) में अपने वंश का नाम कोशानो लिखवाया हैं| गूजरों के कसाना गोत्र को उनके अपने गूजरी लहजे में आज भी कोसानो ही बोला जाता हैं| अतः गुर्जरों का कसाना गोत्र कोशानो का ही हिंदी रूपांतरण हैं| कोशानो शब्द को ही गांधारी प्राकृत में कुषाण के रूप में अपनाया गया हैं| क्योकि कनिष्क के राजपरिवार के अधिकांश अभिलेख प्राकृत में थे अतः इतिहासकारों ने उनके वंश को कुषाण पुकारा हैं|

लाहौर से 1911 में प्रकाशित एच. ए. रोज द्वारा लिखित पुस्तक दी ग्लोसरी ऑफ़ ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ दी पंजाब एंड नार्थ वेस्टर्न फ्रंटियर प्रोविंस, में पंजाब के अनुसार गुर्जरों में यह सामाजिक मान्यता हैं कि उनके ढाई घर असली हैं- कसाना, गोरसी और आधा बरगट| इस प्रकार गुर्जरों की कसाना गोत्र इनकी उत्पत्ति के लिहाज़ से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं| कसाना गोत्र  क्षेत्र विस्तार एवं संख्याबल की दृष्टि से भी सबसे बडा है जोकि  अफगानिस्तान से महाराष्ट्र तक फैली हुआ है|

कोशानो (कसाना) गुर्जरों का एक प्रमुख गोत्र क्लेनहैं जिसकी आबादी भारतीय उपमहादीप के अनेक क्षेत्रो में हैं| कसाना गुर्जरों के गाँवो के सर्वेक्षण के माध्यम से रखे गए तथ्यों पर आधारित मेरा मुख्य तर्क यह हैं कि भारतीय उपमहादीप में कुषाण वंश विलीन नहीं हुआ हैं बल्कि गुर्जरों के एक प्रमुख गोत्र/ क्लेन के रूप में कोशानो (कसाना) पहचान निरंतर बनी हुई हैं तथा ऐतिहासिक कोशानो का गुर्जरों साथ गहरा सम्बन्ध हैं|

भारतीय महाद्वीप के पश्चिमी उत्तर में हिन्दू कुश पर्वतमाला से सटे दक्षिणी क्षेत्र में गुर्जर गुजुर कहलाते हैं| गुजुर (गुशुर) शब्द कोशानो के अभिलेखों में उनके राजसी वर्ग के लिए प्रयोग हुआ हैं| यहाँ गुर्जर मुख्य रूप से तखार, निमरोज़, कुन्डूज, कपिसा, बगलान, नूरिस्तान और कुनार क्षेत्र में निवास करते हैं| कसाना, खटाना, चेची, गोर्सी और बरगट गुर्जरों के प्रमुख गोत्र हैं तथा इनकी भाषा गूजरी हैं| यह क्षेत्र यूची-कुषाण शक्ति का आरंभिक केंद्र हैं| क्या ये महज़ एक इत्तेफाक हैं कि यह वही क्षेत्र हैं जहाँ कनिष्क कोशानो के पड़-दादा कुजुल कडफिस ने ऐतिहासिक यूची कबीलों का एक कर महान कोशानो साम्राज्य की नीव रखी थी?

1916 में लाहौर से प्रकाशित डेनजिल इबटसन की पंजाब कास्ट्सपुस्तक के अनुसार हजारा, पेशावर, झेलम, गुजरात, रावलपिंडी, गुजरानवाला, लाहौर, स्यालकोट, अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा, रोहतक, हिसार, अम्बाला, करनाल, दिल्ली और गुडगाँव में कसाना गुर्जर पाये जाते हैं| जिला गुजरात, गुरुदासपुर, होशियारपुर और अम्बाला में इनकी अच्छी संख्या हैं| इबटसन के विवरण से स्पष्ट हैं कि पंजाब, हिमांचल प्रदेश, हरयाणा, दिल्ली आदि प्रान्तों में कसाना गुर्जर आबाद हैं तथा प्राचीन ऐतिहासिक गांधार राज्य की सीमा के अंतर्गत आने वाली कुषाणों की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) और उसके उत्तरी तरफ मरदान, चित्राल और स्वात क्षेत्र में भी गुर्जरों की अच्छी खासी आबादी हैं| कनिष्क की गांधार कला के विकास में विशेष भूमिका थी| होशियारपुर जिला गजेटियर, 1904 के अनुसार गूजरों के ढाई गोत्र कसाना, गोर्सी और बरगट के अतिरिक्त चेची, भूमला, चौहान और बजाड़ आदि जिले में प्रमुख गोत्र हैं|

जम्मू और कश्मीर राज्य में भी कसाना गुर्जरों का एक प्रमुख गोत्र हैं| कसाना, खटाना, चेची, पढाना/भडाना, लोढ़ा, पसवार/पोषवाल तथा बागड़ी जम्मू कश्मीर में गुर्जरों के प्रमुख गोत्र हैं| कश्मीर के मीरपुर क्षेत्र में कसाना गुर्जरों का प्रमुख गोत्र हैं|

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा और ऊना जिले के गूजरों में कसाना प्रमुख गोत्र हैं|

उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद जिले के लोनी क्षेत्र में कसाना गोत्र का बारहा यानि 12 गाँव की खाप हैं| इस कसाना के बारहा में रिस्तल, जावली, शकलपुरा, गढ़ी, सिरोरा, राजपुर, भूपखेडी, मह्मूंदपुर, धारीपुर, सीती, कोतवालपुर तथा मांडला गाँव आते हैं| इनके पड़ोस में ही रेवड़ी और भोपुरा भी कसाना गुर्जरों के गाँव हैं| जावली तथा शकलपुरा इनके केंद्र हैं| कसानो के इस बारहा का निकल दनकौर के निकट रीलखा गाँव से माना जाता हैं| रीलखा से पहले इनके पूर्वजों का राजस्थान के झुझुनू जिले की खेतड़ी तहसील स्थित तातीजा गाँव से आने का पता चलता हैं| इतिहासकार रामशरण शर्मा के अनुसार गुर्जर प्रतिहारो ने अपनी विजेता सेना के सरदारों को 12 या उसके गुणांक 24, 60, 84, 360 की समूह में गाँव को प्रदान किये थे| इन विजेता सरदारों ने अपने गोत्र के भाई-बंद सैनिको को ये गाँव बाँट दिए| सभवतः ये 12 गाँव गुर्जर प्रतिहारो के काल में नवी शताब्दी में उनकी उत्तर भारत की विजय के समय यहाँ बसे हैं|
मेरठ जिले के परतापुर क्षेत्र में कुंडा’, मेरठ मवाना मार्ग पर कुनकुरा’, मुज़फ्फरनगर जिले में  शुक्रताल के पास ईलाहबासतथा गंगा पार बिजनोर जिले में  लदावली कसाना गोत्र के गाँव चौदहवी शताब्दी में जावली से निकले हैं| इसी प्रकार दादरी क्षेत्र के हाजीपुर, नंगला, रूपबास रामपुर और चिठेडा के कसाना गुर्जर लोनी क्षेत्र स्थित महमूदपुर गाँव से सम्बंधित, 1857 की जनक्रांति के मशहूर स्वतंत्रता सेनानी शहीद तोता सिंह कसाना जी के वंशज हैं|

रूहेलखंड के गुर्जरों में कसाना गोत्र के अनेक गाँव हैं| मुरादाबाद के निकट मुरादाबाद हरिद्वार राजमार्ग पर लदावली कसाना को प्रसिद्ध गाँव हैं| अमरोहा जिले की हसनपुर तहसील में हीसपुर कसानो का प्रमुख गाँव हैं|
चंबल नदी की घाटी में स्थित उत्तर प्रदेश के आगरा, मध्य प्रदेश के मुरेना, ग्वालियर भिंड, शिवपुरी, दतिया तथा राजस्थान के समीपवर्ती धोलपुर जिले के उबड़-खाबड़ दुर्गम बीहड़ क्षेत्रो में गुर्जरों की घनी आबादी हैं| इस कारण से इस पूरे क्षेत्र को स्थानीय बोलचाल में गूजराघार भी कहते हैं| चंबल क्षेत्र स्थित इस गूजराघार में कसाना गोत्र के 100 गाँव हैं| गूजराघार में कसाना गोत्र के गांवों की शुरुआत आगरा की बाह तहसील के सैंय्या से हो जाती हैं| इनमे सबसे ज्यादा, कसाना नख के 28 गाँव राजस्थान के धौलपुर जिले में तथा 22 गाँव मुरेना जिले में हैं| 1857 की जनक्रांति के नायक सूबा देवहंस कसाना का गाँव कुदिन्ना भी धोलपुर जिले में हैं| मुरेना में नायकपुरा, दीखतपुरा, रिठोरा, गडौरा, हेतमपुर एवं जनकपुर कसाना गुर्जरों के प्रमुख गाँव हैं| नायकपुरा गाँव कसानो का केंद्र माना जाता हैंगूजराघार का यह दुर्गम क्षेत्र कोशानो के उनकी राजधानी और अंतिम शक्ति केंद्र मथुरा के दक्षिण पश्चिम में सटा हुआ हैं| सभवतः मथुरा क्षेत्र में नाग वंश और गुप्तो के उत्कर्ष के फलस्वरूप कोशानो तथा अन्य गुर्जरों को इस निकटवर्ती दुर्गम क्षेत्र में प्रव्रजन करना पड़ा| राजपूताना गजेटियर के अनुसार राजस्थान के गुर्जरों का निकाल मथुरा से माना जाता हैं| संभवतः राजस्थान के गुर्जरों में यह मान्यता मथुरा क्षेत्र से इस प्रव्रजन का स्मृति अवशेष हैं|

राजस्थान के गुर्जरों में गोत्र के लिए परम्परागत रूप से नखशब्द प्रचलित हैं| राजस्थान में कसाना नख की सबसे बड़ी आबादी धौलपुर जिले में हैं जहाँ इनके 28 गाँव हैं| धोलपुर जिले की बाड़ी तहसील में कसानो का बारहा हैं| इनमे गजपुरा, कुआखेडा, रेहेन, बरैंड, लालौनी, सौहा, अतराजपुरा आदि गाँव हैं|

भरतपुर जिले में में कसाना नख के 12 गाँव की खाप हैं| इनमे झोरोल, सालाबाद, नरहरपुर, दमदमा, लखनपुर, खैररा, खटोल, भोंडागाँव, गुठाकर, निसुरा आदि प्रमुख गाँव हैं|

जयपुर जिले के कोटपूतली क्षेत्र में कसाना नख के 5 गाँव हैं, इनमे सुन्दरपुरा, पूतली, खुर्दी, अमाई, कल्याणपुरा खुर्द आदि मुख्य हैं|
राजस्थान के दौसा जिले के सिकंदरा क्षेत्र में कसाना नख के 12 गाँव की खाप हैं| डिगारया पत्ता, बरखेडा, डुब्बी, कैलाई, भोजपुरा, बावनपाड़ा, सिकंदरा, रामगढ़, बुडली, टोरडा बगडेडा| अलवर जिले में इन्द्रवली 

झुंझुनू जिले की खेतड़ी तहसीलमें पांच गाँव हैं- ततिज़ा, कुठानिया, बनवास, गूजरवास और देवटा|

सन्दर्भ-

1. Alexander, Cunningham, Archeological survey India, Four reports made during 1862-63-64-65, Vol . II, Simla, 1871, Page 70-73
2. Pandit Bhagwanlal Indraji, Early History of Gujarat (art.), Gazetteer of the Bombay Presidency, Vol I Part I, , Bombay 1896,
3. Denzil Ibbetson, Panjab Castes, Lahore 1916
4. H A Rose, A Glossary Of The Tribes and Castes Of The Punjab And North-Western Provinces, Vol II, Lahore, 1911,
5. Edwin T Atkinson, Statistical, Descriptive and Historical Account of The North- Western Provinces Of India, Vol II, Meerut Division: Part I, Allahabad, !875, Page 185-186 https://books.google.co.in/books?id=rJ0IAAAAQAAJ
6. A H Bingley, History, Caste And Cultures of Jats and Gujars https://books.google.co.in/books?id=1B4dAAAAMAAJ
7. D R Bhandarkar, Gurjaras (Art.), J B B R S, Vol. XXI,1903
8. G A Grierson, Linguistic Survey of India, Volume IX, Part IV, Calcutta, 1916
9. सुशील भाटी, गुर्जरों की कुषाण उत्पत्ति का सिधांत, जनइतिहास ब्लॉग, 2016
10. सुशील भाटी, जम्बूदीप,का सम्राट कनिष्क कोशानो,जनइतिहास ब्लॉग, 2018
11. Babu Gurjar https://gurjarithas.blogspot.com


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बगडावत कथा -15




                         बगडावत  कथा -15

इधर युद्धभूमि से वापिस आकर नेतुजी नियाजी को जगाती है और कहती है कि उठिए, आप के दोनों बेटे घमासान युद्ध में मारे गए हैं। जब नियाजी उठते हैं तो देखते हैं कि उनके महल की छत पर बहुत सारी गिरजें (चीलें) बैठी हुई हैं। नियाजी गिरजों से पूछते हैं कि कहो आपका यहाँ कैसे आना हुआ। गिरजें कहतीं हैं कि हमें रावजी और बगड़ावतों के युद्ध की खबर सात समुन्दर पार से लगी है। कलयुग के इस महाभारत में हम अपनी भूख मिटाने आई हैं। अगर आप हमारी भूख मिटाने का वचन दो तो हम यहाँ रुकें नहीं तो वापस जाएं। नियाजी जवाब देते हैं कि इस युद्ध में मैं बहुत लोगों के सिर काटूगां। तुम पेट भर कर खाना। और अगर तुम मेरी बोटियाँ खाना चाहती हो तो ६ महीनें बाद आना। मैं ६ महीने का भारत करुँगा (नियाजी को ६ महीने आगे तक का पहले से ही आभास हो जाता था) नियाजी युद्ध में जाने से पहले भगवान से प्रार्थना करते हैं कि मैं महल में बहुत आराम से रहा और अगले जन्म भी मुझे इसी देश में ही भेजना और भाई भी सवाई भोज जैसा ही देना। फिर नेतुजी नियाजी की आरती उतारती है और युद्ध में जाने के लिए उनके तिलक करती हैं। नेतुजी फिर नियाजी को सवाईभोज से मिलने जाने के लिए कहती है। नियाजी, नेतुजी कि बात मानकर सवाई भोज से मिलने जाते हैं। जब दोनों भाई गले मिलते हैं तब दोनों की आँखों में आँसू आ जाते हैं कि अबके बिछ्ड़े जाने कब मिलेगें। नियाजी कहते हैं कि अब हमारा मिलना नहीं होगा। नियाजी फिर रानी जयमती से भी मिलते हैं और एक वर मांगते हैं कि हमारे मरने के बाद हमारा नाम लेने वाला कौन होगा ? भवानी कहती है कि बहरावत का बेटा भूणा जी और सवाई भोज के वारिस मेहन्दूजी पानी देने के लिए रहेंगे। इन दोनों को तुम राज्य से दूर भेज दो, तो ये बच जाऐंगे। और तुम बगड़ावतों का नाम लेने वाला छोछू भाट रहेगा। और तुम्हारे यहाँ भगवान स्वयं अवतार लेंगे। इतना सुन नियाजी सवाई भोज के पास वापस आ जाते हैं। और उनके महल में अपनी बड़ी भाभी (सवाई भोज की पहली रानी पदमा दे) को बुलवाकर मेहन्दूजी को ले जाने का आग्रह करते हैं। पदमा दे बड़े भारी मन से अपने बेटे को नियाजी के साथ विदा करती है और यह तय होता है कि वो बगड़वतों के धर्म भाई भैरुन्दा के ठाकुर के पास अजमेर में रहेगा। सवाई भोज उस समय मेहन्दू के साथ कुछ सेवक और घोड़े और उनके खर्चे के लिये काफी सारी सोने की मोहरें एवं काफी सारी धन-दौलत भी भेजते हैं। सवाई भोज कहते हैं बेटा मेहन्दू कई वर्ष पहले एक बिजौरी कांजरी नटनी अपने यहां कर्तब दिखाने आयी थी तब उसे हमने ढ़ाई करोड़ का जेवर दान में दिया था। उसमें से आधा तो वो अपने साथ ले गयी और आधा (सवा करोड़ का) जेवर यहीं छोड़ गयी थी वो मेरे पास रखा है। मेरे मरने के बाद अगर वो आ जाये तो तुम ये जेवर उसे दे देना और उसके नाम का यह खत भी उसे दे देना। जेवर को एक रुमाल की पोटली में बांध कर दे देते हैं और कहते हैं कि अगर वो नहीं आये तो यह धन अपने पास मत रखना इसे कोई भी जनसेवा के काम में लगा देना। कुंआ, तालाब, बावड़ी बनवा देना। इतना कहकर सवाई भोज नियाजी और मेहंदूजी को भारी मन से भेरुन्दा ठाकुर के पास भेजने के लिए विदा करते हैं। और संदेश देते हैं कि जब कभी भी बिजौरी कांजरी आए, यह जेवर उसे मेहन्दू के हाथ से दिला देना। सवाई भोज मेहन्दु जी के अलावा बगड़ावतों के ४ और बच्चे नियाजी को दे देते हैं और कहते हैं कि इन सबको भेरुन्दा ठाकुर के पास पहुँचा देना रानी जयमती को इस बारे में पता चलता है तो वो हीरा को कहती है कि नियाजी चोरी करके ४ बच्चों को ले गए हैं लेकिन मैं किसी को नहीं छोडूंगी और वह अपना चक्र चला कर मेहन्दूजी के अलावा बाकी सब बच्चों के शीश काट लेती है। मेहन्दू जी भेरुन्‍दा ठाकुर के पास अजमेर चले जाते हैं। यहां से फिर नियाजी अपनी रानी नेतुजी को साथ लेकर बाबा रुपनाथजी के पास गुरु महाराज के दर्शन के लिये रुपायली जाते हैं। और उनके पांव छूकर कहते हैं कि गुरुजी आज्ञा दो तो युद्ध शुरु करे, बाबा आशिष देवो। नियाजी बाबा रुपनाथजी की परिक्रमा लगा कर कहते हैं मेरे जैसे चेले तो आपको बहुत मिल जायेगें, मगर मुझे आप जैसा गुरु फिर नहीं मिलेगा। बाबा रुपनाथजी कहते हैं, बच्चा यह क्या कहते हो, मेरे जैसे तो बाबा बहुत मिल जायेगें मगर तेरे जैसा चेला नहीं मिलेगा। नियाजी कहते हैं कि जब मैं अगला जन्म लूं तो मुझे शेर का जन्म देना ताकि मेरे मरने के बाद आपके बिछाने के लिए मेरी खाल काम आ जाए। नेतुजी बाबा रुपनाथ से कहती है कि मेरे पति को अगले जन्म में अगर शेर का जन्म मिले तो मुझे शेरनी का जन्म देना ताकि मैं उनके साथ वन में रह कर उनके दर्शन करती रहूँ। बाबा रुपनाथ फिर नेतुजी से कहते हैं कि अगर नियाजी का शीश भवानी ले जाए तो तू इसका खाण्डा अपने साथ ले जाना और इसके खाण्डे के साथ ही सती हो जाना। बाबा रुपनाथ यह वचन नेतुजी से ले लेते हैं। बाबा रुपनाथ जी नियाजी को अपनी कुटिया के अन्दर ले जाते हैं। उन्हें एक जड़ी-बूटी देते हैं और कहते हैं कि इसे अपने साथ युद्ध-भूमि पर ले जाओ। नियाजी को जड़ी देकर बाबा रुपनाथ कहते हैं कि यह ऐसी जड़ी है जिसके असर से सिर कटने के बाद भी तुम ८० पहर तक दुश्मन से लड़ सकते हो। तुम इसे अपनी जांघ पर बांध लो लेकिन इसकी खबर किसी को भी मत देना।






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बगडावत कथा-14


            बगडावत  कथा -14


दूसरा हमला रावजी नेगड़िया पर करते हैं। वहां नियाजी ६ महीने की नींद में सो रहे होते हैं। नियाजी की रानी नेतुजी हाथ में जल की जारी ले कर उन्हें जगाने आती है। लेकिन नियाजी नहीं जागते। फिर नेतुजी नियाजी की माँ लखमादे राठौड़ को नियाजी को जगाने के लिए बुलाती है। लेकिन वे भी उनको नहीं जगा पाती तब नियाजी के लड़के जोधा और जगरुप अपनी माँ को कहते हैं कि पिताजी को क्यूं जगाती हो, उन्हें सोने दो हम लड़ाई करने जायेगें। माँ नेतुजी अपने बेटो को मना करती है कि अभी तुम छोटे हो ( ९ बरस के) अभी तुम्हारी युद्ध में जाने की उम्र नहीं है। इस पर जोधा और जगरुप जिद करते हैं कि हम रावजी से अकेले ही निपट लेगें। पिताजी (नियाजी) को सोने दो, उन्हे मत जगाओ। नेतु अपने दोनों बेटो जोधा-जगरुप की आरती करती है और उन्हें युद्ध के लिये भेजती है। जोधा-जगरुप रावजी से युद्ध करने जाते हैं। दोनों भाई रावजी की फौजों से लडाई करते हुए कई सामंतो और सरदारों को मार देते हैं और तीन दिन तक लगातार युद्ध करते रहतें हैं। जोधा-जगरुप का युद्ध देखकर भवानी हीरा को कहती है कि ये दो लड़के युद्ध करने आये हैं और रावजी की फौज के साठ हजार सैनिकों को खत्म कर दिया। यह देख रानी भवानी ने एक चक्र चलाया औरे दोनों भाइयों के माथे उतार लिये। जब रावजी ने दीयाजी से पूछा की आज की लड़ाई कैसी रही। दीयाजी ने कहा टोड़ा का रावजी आज काम आ गये और हमने सभी फौज में मरने वालों की पगड़ी और शव उनके घर भेज दिये हैं। नेतुजी साड़ीवान से युद्ध के समाचार पूछती है, तो साड़ीवान कहता है कि आपके कुवंरों ने युद्ध तो अच्छा किया लेकिन वह दोनों भी मारे गए। जोधा और जगरुप दोनों ही शादीशुदा नहीं थे इसलिए नेतुजी जब अपने बेटों के कटे हुए सिर और धड़ो की आरती के लिये आती है, गिरजों से बात करती है और पूछती है कि तुमने मेरे बेटों की लाशों को क्यों नहीं खाया। गिरजे जोधा-जगरुप की लाशों को देखकर कहती है कि अभी इनकी मरने की उम्र नहीं थी,मगर भवानी को लाने से यह दिन देखना पड़ा। इसलिए हम इन्हें नहीं खाना चाहती। भवानी जोधा और जगरुप के सिर अपनी मुण्ड माला में धारण करती है। नेतु अपने दोनों बेटो के कटे हुए धड़ की आरती उतार कर विलाप करती है। और अपने पति नियाजी को जगाने के लिए महल में चली जाती ह। तीसरा हमला रावजी की सेना अटाली पर करती है जहां बगड़ावत भाई अटाल्‍याजी अपनी एक हजार सेना के साथ रावजी के साथ युद्ध करते हैं। रावजी के छोटे भाई (तीसरे नम्बर के) आमादेजी मारे जाते हैं। रावजी की सेना से संग्राम करते हुए अटाइल्‍याजी, आलोजी भी युद्ध में मारे जाते हैं और भवानी उनका सिर काट अपने मुण्ड माला में धारण कर लेती है। चौथा हमला रावजी रायला पर करते हैं जहां सवाई भोज की बेटी दीपकंवर बाई रावजी की सेना में मारकाट मचा देती है। दीपकंवर बाई मर्दाना वेष कवच धारण कर रावजी की सेना से घोर संग्राम करती है और उनकी काफी सारी सेनाओं को अपनी तलवार से काट डालती है। अन्त में वह दियाजी और कालूमीर से युद्ध करते हुए मारी जाती है। जिसका सिर काट कर भवानी (जयमती) ने अपनी मुण्ड माला में धारण किया था। बगड़ावतों के बड़े भाई तेजाजी को जब दीपकंवर की मौत का पता चलता है तो वह भी युद्ध में आ जाते हैं और अपने घोड़े को रावजी की फौज के सामने खड़ा कर देते हैं और दीयाजी और कालूमीर की फौज काट देते हैं। तेजाजी सात-सात कोस तक रावजी की फौज को काट डालते हैं और अपना भाला रावजी पर फेंकते हैं पर उस भाले के वार से भवानी रावजी को बचा लेती है ।







बगडावत कथा-13



                बगडावत  कथा -13

जब रावजी शिकार से वापस लौटते हैं, तब महल में रानी के गहने पड़े हुए देखते है। उन्हें नीमदेजी कहते हैं कि भाई, बगड़ावत रानी सा को भगाकर ले गये हैं। ये बात सुनकर रावजी को यकीन नहीं होता और कहते हैं वो तो हमारे भायले है वो ऐसा नहीं कर सकते हैं। जब चारों ओर साड़ीवान ( सवारसंदेश वाहक) दौड़ाए जाते हैं कि रानी सा का पता लगाओ। रावजी को संदेश वाहक से पता चलता है कि रानी सा तो बगड़ावतों के यहां गोठां में है तब जाकर रावजी को विश्वास होता है कि बगड़ावत रानी को भगाकर ले गये हैं। रावजी नियाजी को एक परवाना लिखकर भेजते हैं कि भाई राणी को वापस भेज दो। नियाजी जवाब में रावजी को पत्र लिखते हैं कि हमने तो रानी शिवजी के चढ़ा दी है और आपको रानी चाहिए तो दूसरा ब्याह कर लो। दूसरा परवाना रावजी ने बाघजी को लिखा कि रानी ने ले ग्या बेटा बाघ का, नियाजी को समझा कर रानी को वापस भेजो। बाघजी ने रावजी को जवाब लिख भेजा कि रानी तो शिवजी को चढ़ा दी है। और आपको रानी चाहिए तो दूसरा ब्याह कर लो। रावजी बगड़ावतों को समझाने का खूब प्रयास करते हैं कि रानी सा को वापस राण पहुंचा दो नहीं तो अन्जाम बुरा होगा। जो भी बगड़ावतों के पूर्वज थे उनके माध्यम से (बिसलदेवजी, बाघ सिंघ जी और कई राजाओं, सामन्तों के साथ) संदेश भेज बगड़ावतों को समझाने के प्रयास किये गये मगर बगड़ावत अपनी बात पर अड़े रहते हैं। अब रावजी एक संदेश बाबा रुपनाथ के यहां भेजते हैं कि आप के चेले बगड़ावत रानी को ले गए हैं, आप उन्हें समझाइए कि वे रानी को वापस भेज दें। बाबा रुपनाथ रावजी को जवाब देते हैं कि रानी तो अब हमारी शरण में आ चुकी है। आपको अगर लड़ाई करनी है तो पहले रुपायली पर हमला करो। बगड़ावतों तक जाने की जरुरत ही नही है। फिर बाबा रुपनाथ बगड़ावतों को संदेश भेजते हैं कि आप सब लोग लड़ाई की तैयारी कर लो। रावजी से युद्ध करना है। अब चाहे जो हो जाये, रानीजी को वापस नहीं भेजना है। सभी बगड़ावत अपने गुरु का संदेश पढ़कर जोश से भर जाते हैं। एक संदेश तेजाजी को पाटन की कचहरी में भी भेजा जाता है और तेजाजी भी युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं। लड़ाई शुरु करने से पहले बगड़ावत अपने सभी सामन्तों को सन्देशवाहक भेजकर फौज इकट्ठी कर लेते हैं और दुगने जोश से युद्ध की तैयारी के लिये अपने-अपने खैड़ो पर पहुंच जाते हैं। रानी जयमती को दिये वचन के अनुसार सभी भाईयो को अलग-अलग अपने खैड़ो से ही लड़ाई लड़नी थी। इधर रावजी अपने ५२ गढ़ो के खास सामन्तो जिनमें दियाजी, कालूमीर पठान, टोडा का सोलंकी, इत्यादि के साथ अपनी सेना को रुपायली में पहला हमला (बाबा रुपनाथ पर) करने भेजते हैं। वहां बाबा रुपनाथजी अपने सभी नागा साधुओं की फौज के साथ युद्ध के लिये तैयार होते है। बाबा रुपनाथजी रावजी की फौज को आते देख अपने पालतु कुत्तो को खुला छोड़ देते है। गाथा के अनुसार इनकी संख्या ५०० बताई गई है। रावजी की फौज इन कुत्तो के हमले से घबरा जाती है। ऊपर से नागा साधुओं के हमले से भाग छूटती है। और रावजी के यहां वापस लौट आती है। उनके कई सैनिक इस लड़ाई में मारे जाते हैं।




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बगडावत कथा-12



                              बगडावत  कथा -12

राणा रावजी और सारे सामन्तो को शिकार के बहाने दूर भेजकर रानी जयमती और हीरा बगड़ावतों के साथ भागने की योजना बनाती है। रावजी शिकार पर जाते समय नीमदेवजी को पहरे पर लगा जाते हैं कि रानी का ध्यान रखना। रानी हीरा से कहती है कि हीरा रावजी तो गये पर नीमदेवजी को पहरे पर लगा गये। अब इसका क्या उपाय करें। हीरा कहती है बाजार से जहर मंगवाओ और लाडू बनवाओ। जहर के लड्डू बनते हैं और भैरुजी के चढ़ाकर हीरा सब को बांट देती है। जो भी लड्डू खाता है वो ४ घंटे की नींद सो जाता है। जिस रास्ते से जाना है उस रास्ते हीरा सब को लड्डू बांटकर वापस आती है ताकि उन्हें जाते हुए कोई देख ना सके। चावण्डिया भोपाजी लाडू खाते हैं तो हीरा से कहते हैं, हीरा मैंने तो मीठा मुहं कई वर्षों बाद किया है। हीरा कहती है लाडू तो सब को दे दिये मगर नीमदेवजी की सवारी महल के सामने घूम रही है। हीरा कहती है रानी जी श्रृंगार करो और पीछे के रास्ते से बगड़ावतों के यहां चलते हैं। हीरा रेशम की डोर लेकर आती है और उसकी रस्सी बनाती है और महल की पिछले वाली खिड़की से रेशम की रस्सी डालती है जिसके सहारे दोनों महल से बाहर निकल आते हैं। रानी और हीरा दोनों नौलखा बाग के बाहर आकर अपनी माया के प्रभाव से बाग के दरवाजे के ताले खोल देती है। ये देख कर बाग का माली रानी जी के पांव छूता है और रानी जी बगड़ावतों से मिलने अंदर जाती है। सवाई भोज अपनी बूंली घोड़ी पर रानी जयमती को और नियाजी अपने नौलखे घोड़े पर हीरा को बैठाकर राण से भाग निकलते हैं। रास्ते में रानी सोचती है कि बगड़ावतों की परीक्षा लेती हूं और देखती हूं कि ये रावजी की सेना से मुकाबला कर पायेगें कि नहीं। रानी वहीं पर घोड़े से उतर जाती है और अपने पांव की पायल खोलकर गिरा देती है और कहती है मेरी पायल बावड़ी में गिर गयी है उसे निकालो। अपनी करामात दिखाओ नहीं तो मुझे यहीं छोड़ कर वापस चले जाओ। सवाई भोज शिव महादेव जी का ध्यान करते हैं, और पानी के ऊपर पायल तैरने लग जाती है,सवाई भोज रानी को पायल वापस दे देते हैं। जब वो वापस वहां से चलने लगते हैं तब भवानी घोड़े पर सवार सवाई भोज के कलेजे (दिल) पर हाथ रखे होती है और अपने मैल से तीतर बनाकर घोड़ी के पावों में छोड़ देती है जिससे घोड़ी चमक जाती है, और उछलती है। तब सवाई भोज की धड़कन तेज हो जाती है और रानी जयमती कहती है कि सवाई भोज जी घोड़ी के चमक जाने से ही आपका कलेजा जोर से धड़कने लगा है। आप मुझे लेकर जा तो रहे हो, मगर रावजी की विशाल सेना के सामने क्या लड़ सकोगे। तो सवाई भोज को जोश आ जाता है और वो अपनी तलवार से ११ हाथ की भाटा चट्टान को चीर देते हैं। ये देख कर रानी सोचती है कि एक ही वार से चट्टान चीर दी, रावजी का क्या हाल होगा, जब सभी २४ भाई एक साथ लड़ाई करेगें। रानी जयमती वहीं पर सवाई भोज से वचन लेती है कि रावजी से युद्ध के समय आप सभी २४ भाई अपनी सेना के साथ रावजी से एक-एक कर युद्ध करोगे। सभी भाई साथ मिलकर युद्ध नहीं करोगें। सवाई भोज रानी जयमती को ये वचन दे देते हैं कि हम साथ मिलकर युद्ध नहीं करेंगे। सवाई भोज रानी जयमती को गोठां में लाने से पहले राता देवरा में उतारते हैं। राता देवरा में सवाई भोज और नियाजी भवानी को दारु पीने के लिये मनुहार करते हैं, भवानी कहती कि आप लोग माथा (सिर) देवो तो में दारु पीउ और कहती है कि आपके घर से मुझे बधाई के गीत गाते हुए लेने आएं तो मैं घर चलूं। जब बगड़ावत वहाँ से घर वालों को खबर देने गोठां चले जाते हैं तब वहाँ पर पोमा घासी आ जाता है और राणी से कहता है, आप मेरे साथ शादी कर लो, बगड़ावतों के यहां तो पहले से ही बहुत रानियां है। भवानी उससे बगड़ावतों के घर की सारी बातें पूछ लेती है। और बाद में नोहत्थी नाहरी बन के हुंकार करती है। पोमा घासी नाहरी को देखकर डर के मारे गिर जाता है, उसके रोटी और प्याज बिखर जाते हैं और पानी की बतूकड़ी फूट जाती है। गांव की गुर्जर महिलाएं बधाई के गीत गाते हुए रानी को लेने के लिये आती हैं। साथ में २४ भाईयों की राणीयां भी आती हैं। जब नेतूजी और दीपकवंर रानी जयमती के पास आती है तो रानी जयमती दीप कंवर से पूछती है की तू किसकी बेटी है और ये किसकी बहू। दीपकंवर बाई रानी को जवाब देती है कि मै सवाई भोज की लड़की और ये काका नियाजी की रानी नेतुजी हैं। सभी रानियाँ तो रानी जयमती के पांव छूती हैं मगर नेतूजी नहीं छूती। जब सब औरतें रानी को लेकर गोठां पहुंचती है तो वहां पर साडू माता आरती ऊतारकर नववधु का स्वागत करती है। रानीजी साडू माता से कहती है कि आपने बहुत प्यार से मेरा स्वागत किया है आज तो मैं आपकी सौत बनकर आई हूँ। जब देवनारायण भगवान आपकी गोद में खेलेंगे तब मैं आपकी बहू बनकर आऊँगी। रानी जयमती को उनके महल में ले जाया जाता हैं। रानी जयमती और सवाई भोज गोंठा के महल में चौपड़ खेलते हैं।









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बगड़ावत कथा -11


                            बगडावत कथा -11

हीरा रावजी के दरबार में जाकर फरियाद-फरियाद चिल्लाती है। रावजी पूछते है हीरा क्या बात हैं। हीरा कहती है दरबार बाईसा के पेट में बहुत दर्द हो रहा है और लगता है बीमारी इनकी जान लेकर ही छोड़ेगी। रावजी नीमदेवजी को कहते है भाई नीमदेव रानीजी की बीमारी बढ़ती ही जावे है। कोई अच्छा जाना-माना भोपा हो तो पता करवाओं। ६ महीनो से ये बीमारी निकल ही नहीं रही है। नीमदेवजी उडदू के बाजार में आते हैं। वहाँ उन्हें चांवडिया भोपा मिलता हैं और नीमदेवजी से कहता है कि डाकण (डायन), भूत, छोट (प्रेत), मूठ (दुष्ट आत्मा) को तो मैं मिनटों में खत्म कर देता हूं। उसे नीमदेवजी अपने साथ महलों में ले जाते हैं। नीमदेवजी हीरा से कहते हैं कि इसे ले जा और तेरे बाईसा को दिखा। हीरा भील को रानी जयमती के महल में ले जाती है। रानी अपनी माया से भोपा में भाव डाल देती है जिससे भोपा रावजी के पास आकर कहता है कि मैं रानी जी को ठीक कर सकता हूँ। भोपा ने बताया कि रानी जयमती ने भैरुजी से अपने लिए राजा जैसा वर मांगा था। उन्होनें राजा जैसा वरतो पा लिया मगर भैरुजी की जात अभी तक नहीं जिमाई। इसलिये भैरुजी का दोष लग गया। जात जिमानी पडेगी,नीमदेवजी हीरा से पूछते हैं कि जात जिमाने में क्या लगेगा? हीरा बताती है की १२ मन का पूवा, १२ मणकी पापड़ी, १२ मण का सुवर जिसके बाल खड़े नहीं होवे, खून निकले हुआ नहीं हो, को बाईसा पर वारकर छोड़ो तो बाईसा बचे, नहीं तो नहीं बचेगी। और यह टोटका रावजी के हाथ का ही लगेगा और किसी के हाथ का सूअर नहीं चढ़ेगा। और ये बात सुनते ही रावजी सूअर का शिकार करने के लिये अपनी सेना तैयार करने का हुकम देते हैं। उसमें सभी उमराव दियाजी, कालूमीर, सावर के उमराव और रावजी के खासम खास सरदार और ५०० घुड़ सवार तैयार हुए।इतने में दियाजी ने कहा रावजी मेहलों में पहरा अच्छा लगाना क्योकि २४ बगड़ावत भाई नौलखा बाग में डटे हुए है। वो कहीं रानी सा को उठा कर न ले जाये। रावजी कहते है वो तो मेरे भाई हैं और उन्होनें ही मेरी शादी करवाई और पैसा भी उन्होने ही खर्च किया। वो ऐसा नहीं कर सकते। फिर भी रावजी शिकार पर जाने से पहले नीमदेवजी को पहरे की जिम्मेदारी सोंप कर जाते हैं। उधर रानी जयमती अपने पसीने से एक सूअर बनाती है। उसका वजन १२ मण होता है। और अपनी माया से उसे रावजी के आगे छोड़कर कहा की हे सुवरड़ा राजाजी को नाग पहाड़ से भी आगे दौड़ाता हुआ ले जाना और ४ दिनो तक वापस आने का अवसर मत देना। इस तरह रावजी सुवर के पीछे-पीछे नाग पहाड़ से आगे निकल जाते हैं। नाग पहाड़ पहुंच कर वह माया से बना सूअर गायब हो जाता है।







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बगड़ावत कथा -10


                                        बगडावत  कथा -10

इधर राण में जयमती (भवानी) हीरा से पूछती है कि बगड़ावत आ गये क्या? हीरा जवाब देती है कि मुझे नहीं लगता कि वो आऐगें। जयमती कहती है बादलो में बिजली चमक रही है। बगड़ावतों के भाले चमक रहे हैं, बगड़ावत आ रहे हैं। हीरा कहती है बाईसा मेरे को ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है। बगड़ाबत राण में रानी को लेने आ जाते हैं और नौलखा बाग में ठहरते हैं। सवाई भोज बकरियों की पाली बनाकर रानी के महलों के पिछवाड़े उन्हें चराने निकल जाते हैं और रानी जयमती को संकेत कर देते हैं कि हम आपको लेने आ गये हैं। जैसे ही रानी जयमती को बगड़ावतों के आने की सूचना मिलती है रानी जयमती अपनी माया से अपने पसीने का सूअर बनाकर नौलखा बाग के पास छोड़ देती है। नियाजी की निगाह जब उस पर पड़ती है तो वह उसका शिकार कर लेते हैं। वहां नौलखा बाग में नियाजी और नीमदेवजी की फिर से मुलाकात होती है। नीमदेवजी रावजी के पास जाकर बगड़ावतों के आने की खबर देते हैं। इधर रानी जयमती हीरा को कहती है की जाकर पता करो सवाई भोज के क्या हाल हैं। जब हीरा जाने के लिए मना करती है तो जयमती हीरा को लालच देती है और अपने सारे गहने हीरा को पहनने के लिये देती है। हीरा कहती है ये गहने मुझे अच्छे नहीं लगते हैं, ये तो आपको ही अच्छे लगते हैं। जयमती हीरा को कहती है कि ये गहने पहनकर तू सवाई भोज का पता करने जा। हीरा नौलखा बाग में बगड़ावतों से मिलने पहुंचती है जहां बगड़ावत भाई पातु कलाली की बनाई दारु पी रहे हैं। वहां हीरा के गले में नियाजी दारु का गिलास उण्डेल देते हैं। हीरा दारु पीकर बेहोश हो जाती है और रात भर नौलखा बाग में ही रहती है। बगड़ावत हीरा को जाजम (दरी) से ढक देते हैं, ताकि कोई देख ना ले। जब सुबह हीरा को होश आता हैऔर वह महलों में रानी के पास लौटती है तो किसी को शक न हो इसलिए अपने साथ चावण्डिया भोपा को लेकर आती है और कहती है कि रानी के पेट में दर्द था उसको ठीक करने के लिए इसे लेने गई थी। चावण्डिया भोपा के वापस लौटने के बाद रानी जयमती हीरा को पीटती है और ईर्ष्या वश उसे खूब खरी-खोटी सुनाती है कि तू भोज पर रीझ गयी है। भोज ने रात को तुझे छुआ तो नहीं और क्या-क्या बात हुई बता। जब हीरा सारी बात सही-सही बताती है तब रानी जयमती वापस हीरा को मनाती है, उसे खूब सारा जेवर देती है। एक दिन रात को हीरा और रानी जयमती सवाई भोज से मिलने नौलखा बाग की ओर जा रही होती हैं, संयोग से उस दिन नीमदेवजी पहरे पर होते हैं और वो रानी की चाल से रानी को पहचान जाते हैं। रानी नीमदेवजी को देख पास ही भडभूजे की भाड़ में जा छुपती है। जिसे नीमदेवजी देख लेते हैं और हीरा से पूछते हैं कि हीरा भाभी जी को इतनी रात को लेकर कहां जा रही हो? हीरा सचेत हो कर कहती है कि बाईसा को पेट घणो दूखे है, इस वास्ते भड़भूजे के यहाँ आए हैं। यह झाड़ फूंक भी करना जानता है,बताबा ने आया हैं। नीमदेवजी को हीरा की बात पर विश्वास नहीं होता है। भड़भूजा की भाड़ में छिपी रानी को निकालते हैं और हीरा को कहते हैं कि हीरा तुझे इस सच की परीक्षा देनी होगी। हीरा परीक्षा देने के लिए तैयार हो जाती है। नीमदेवजी लुहार को बुलवाते हैं और लोहे के गोले गरम करवाते हैं। लुहार भट्टी पर लोहे के बने गोलों को तपा कर एकदम लाल कर देता है। जब लुहार लोहे के तपते हुए गोले चिमटे से पकड़कर हीरा के हाथ में देने वाला होता है तब नीमदेवजी हीरा से कहते हैं कि यदि तू सच्ची है तो तेरे हाथ नहीं जलेगें और अगर तू झूठ बोल रही होगी तो तेरे हाथ जल जायेगें। हीरा लोहे के गर्म गोलों को देखती है तो एक बार पीछे हट जाती है और रानी की ओर देखती है। फिर अचानक हीरा को लाल तपते हुए गोले के उपर एक चींटी चलती दिखाई देती है तो वो समझ जाती है कि यह बाईसा का चमत्कार है। और वह तपते हुए गोले को अपने हाथों में ले लेती है। इस पर नीमदेवजी कहते हैं कि रानी जी के पेट में दर्द था तो भड़भूजे को ही महलों मे बुलवा लेते। इतना कहकर नीमदेवजी वहां से चले जाते हैं। इसके बाद नीमदेवजी दरबार में रावजी के पास जाकर रानी की शिकायत करते हैं, और कहते हैं कि कहीं बगड़ावत भाई रानी को उठाकर न ले जाएं। रावजी जवाब देते हैं कि राण में आप जैसे उमराव हैं ऐसे कैसे कोई रानी को उठाकर ले जा सकता है। रानी जयमती दूसरे दिन हीरा के हाथ बगड़ावतों को संदेश भेजती है कि आप कुछ दिन तक यहीं बिराजो, नौलखा बाग को छोड़कर कहीं मत आना जाना। महलों की ओर भी नहीं आना, नहीं तो लोग समझेगें बाईसा त्रिया चरित्र है। रानी जयमती का यह संदेश नियाजी को ही देकर हीरा वापस लौट आती है। जब रानी हीरा से पूछती है कि सवाई भोज से क्या बात हुई तो हीरा बताती है कि सवाई भोज से तो मैं मिली ही नहीं, मैं तो नियाजी से ही मिलकर वापस आ गई हूँ। तब रानी कहती है कि तूने नियाजी से बात क्यों करी? तुझे सवाई भोज से मिलने भेजा था और तू नियाजी से ही मिल कर वापस आ गई। हीरा कहती है रानी जी आपका आज मुझ पर से भरोसा उठ गया है।अब आपका और मेरा मेल नहीं हो सकता है। अब मैं आपके साथ नहीं रह सकती। रानी हीरा को मनाती है और उसकी बढ़ाई करती है। कहती है हीरा तेरे को मैं सारे श्रृंगार करवाऊगीं और हीरा को अपने कपड़े और सारे गहने देती है। मनाती है और हीरा से कहती है तू मेरा साथ मत छोड़। रानी हीरा से कहती है, हीरा यहां से कैसे निकला जाय कोई उपाय करो। हीरा कहती है रावजी का चारों ओर पहरा लगा हुआ है, क्या करें। रावजी को तो हम सूअर का शिकार करने भेज देगें। मगर पहरे का क्या करेगें? हीरा कहती है बाईसा आप पेट दुखने का झूठा बहाना करो। रानी हीरा की सलाह अनुसार ऐसा ही करती है।






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बगड़ावत कथा -9

                 
                                    बगडावत कथा -9

उधर गोठां मे बगड़ावतों के दरबार में सभी भाई बैठे होते है, हीरा चील बनकर आकाश में उड़ती हुई आती है और रानी जयमती का पत्र गिरा देती है। जिसे नियाजी देख लेते हैं और अपनी ढाल से ढक देते हैं। यह सब सवाई भोज देख लेते हैं और नियाजी से अकेले में पूछते हैं कि भाई नियाजी क्या संदेश आया है।वो कागज का परवाना कहां है जो ऊपर से गिरा था। नियाजी को हमेशा 6 महीने आगे का अहसास पहले ही हो जाता था इसलिए वह भांप जाते हैं कि इस परवाने पर अगर हम गौर करेंगे तो सभी मारे जायेगें। सवाई भोज जिद करते हैं तो नियाजी पत्र सवाई भोज को दे देते हैं। सवाई भोज रानी जयमती का पत्र पढ़ते हैं। और फिर सभी बगड़ावत भाई आपस में बैठकर निर्णय लेते हैं कि रानी को रावजी के यहां से भगाकर लाना ही होगा। रानी को भगाकर लाने के बाद क्या होगा, इसके भी सारे परिणामों पर गौर कर लिया जाता है और बगड़ावत सारी तैयारी में जुट जाते हैं। तेजाजी को भी साड़ीवान भेजकर पाटन की कचहरी बुलाया जाता है। साडू माता नियाजी को बुलाकर पूछती है कि क्या बात है, कहाँ की तैयारी है? नियाजी उन्हें सारी बात बता देते हैं कि सवाई भोज की शादी कैसे रानी जयमती के साथ हुई। फिर नियाजी साडू माता से कहते हैं कि हम सब रानी को लेने जरुर जाऐंगे। वो हमारे भाई सवाईभोज के खाण्डे के साथ शादी कर चुकी है। ऐसा कहकर नियाजी और बाकी सभी भाई अपने घोड़ो को तैयार करते हैं। जब साडू माता उन्हें जाने के लिए मना करती है तो नियाजी कहते कि हमने शक्ति को वचन दिया है इसलिए जाना तो अवश्य पडेगा।साडू माता कहती है कि ऐसी औरत को घर लाने से क्या फायदा जिसके लिये खून बहाना पड़े।एक भवानी के लिए आप को अपने माथे देने पड़ेगें। साडू माता फिर नियाजी को समझाती है कि घर में एक औरत है तो दूसरी को क्यों लाते हो? लेकिन नियाजी नहीं मानते और जयमती को लेने जाने की बात दोहराते हैं। तेजाजी की पत्नी तेजाजी को कहती है, आप तो बणीये के भाणजे हो, आप रण में मत जाना। साडू माता कहती है कि मैं आपकी दारु यहीं मंगवा देती हूं। राण में दारु पीने मत जाओ। मैं प्याले भर यहीं पिला दूंगी। तो नियाजी फिर कहते हैं कि वचन दिया हुआ है, जाना तो पडेगा। साडू माता बगड़ावतों को जाने के लिए बार-बार मना करती हैं। साडू माता कहती है कि पर नारी को अंग लगाना अच्छा नहीं है। रावण चाहे कितना ही बलवान था मगर सीता हरण करने से उसका भी अंत हो गया। जयमती रावजी की स्त्री है। पर-नारी को आप भी मत लाओ नहीं तो अन्जाम बुरा होगा। साडू माता नियाजी को बताती है कि मैंने सपना देखा है कि खारी नदी के ऊपर घमासान युद्ध हो रहा है। कटे हुए माथों का ढेर लगा हुआ है। मेरी आखों से आंसू आ रहे हैं। साडू माता कहती है कि मैंने भवानी को मुण्ड मालाधारण किये हुए खारी नदी के घाट पर बैठे देखा है। इस पर नियाजी कहते हैं कि माताजी सपना तो झूठा होता है, सपने पर क्या यकीन करना। जब बगड़ावत साडू माता के बहुत समझाने पर भी नहीं मानते हैं तो साडू माता बगड़ावतों के गुरुजी को एक पत्र लिखती है कि गुरुजी आप के चेले गलत राह पर जा रहे हैं। आप आकर इन्हें समझाओ। बाबा रुपनाथजी पत्र का जवाब देते हैं कि साडू माता रानी को तो जरुर लाना है। नियाजी बाबा रुपनाथजी का पत्र पढ कर सबको सुनाते हैं बगड़ावतों के यहां रणजीत नगाड़ा बजने लगता है।माता साडू कहती है, बाबाजी को तो आग बुझाने के लिये कहा था इन्होंने तो और आग लगा दी है। नियाजी रानी जयमती की सुन्दरता का वर्णन साडू माता के सामने करते हैं। उनके श्रृंगार और रुप के बारे में बताते हुए उन्हें रानी पद्मनी की उपमा देते हैं। इस पर साडू माता नियाजी से कहती है कि आप जाओ और रानी को लेकर आओ मैं नई रानी को अपनी बहन के जैसे समझूंगी और उसे लेकर आओगे तो उसकी आरती उतारकर हंसी-खुशी उसका स्वागत करूंगी। दूसरी सभी रानियाँ साडू माता से कहती हैं कि रानी जयमती है तो बहुत खूबसूरत लेकिन है तो दूसरे की औरत। बगड़ावत राण जाने के लिए अपने घोड़ों का श्रृंगार करते हैं। सवाई भोज हीरों-पन्नों और सोने के जेवरों से सजी हुई बुली घोड़ी पर सवार होकर निकलते हैं। साडू माता बगड़ावतों को शाम के वक्त जाने के लिए मना करती है और सुबह जाने का आग्रह कहती हैं। नियाजी कहते हैं कि जाना तो है ही, आप हमारी वापसी के लिए शगुन करना और अब हमें आज्ञा दो। साडू माता की अनुमति के बाद सभी भाई घोड़ों को नचाते हुए सवार होकर गांव के बाहर इकट्ठे होते हैं और देखते हैं सभी भाई आ गये मगर तेजाजी नहीं आये। नियाजी तेजाजी को परवाना लिखते हैं कि तेजाजी आप पत्र पढ़ते ही जल्दी आ जाना हम आप पर आंच भी नहीं आने देंगे। आपको सुरक्षित वापस लायेगें। आप नहीं आये तो आपका सिर काटकर साथ ले जायेगें। समाचार सुनकर तेजाजी अपने घोड़े पर सवार होकर अपने भाइयों के साथ आ जाते हैं। और सारे बगड़ावत भाई रानी को लेने के लिए राठौड़ा की पाल पर पहुंचते हैं। उधर रानी जयमती के लिये बनाया गया नया महल बनकर तैयार है, रानी जयमती महलों में रहने आ जाती है। जब रावजी अपनी नई रानी जयमती के पास रात को आते हैं, रानी उनके साथ चौपड़ खेलती है और अपनी माया से रावजी को मुर्गा बना देती है और हीरा को बिल्ली बना देती है। रात भर मुर्गा बने रावजी बिल्ली से बचने से लिये इधर-उधर भागते, छिपते रहते हैं। ऐसा क्रम कई दिनों तक चलता रहता है। एक दिन रावजी के छोटे भाई नीमदेजी पूछते हैं कि भाईसा नई रानी में इतना मगन हो गये हो कि आपकी आंखे इतनी लाल हो रही हैं, क्या रात भर सोये नहीं? रावजी कहते हैं कि नीमदे लगता है महल में कोई भूत प्रेत हैं जो रात भर मेरे पीछे बिल्ली बनकर घूमता रहता है और मुझे डराता है।









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